सीमाहीन आसमान मँगोलिया यात्रा की डायरी सुनील दीपक 6 जुलाई 2008

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Mongolia, Bayan Ulgii

13 जून 2008, उलानगोम, रात साढ़े आठ बजे

आज मेरा जन्मदिन था पर यह बात किसी से नहीं कही. फ़िर भी दिन इतना बढ़िया निकला कि बिना कहे ही जन्मदिन मन गया. सुबह उव्स राज्य के गवर्नर ने बुला भेजा और छोटे से समारोह में मुझे पिछले पंद्रह वर्षों में मँगोलिया के विकलांग पुनर्स्थान कार्यक्रम के लिए काम करने के लिए उव्स राज्य की माननीय नागरिकता प्रदान की गयी और राजकीय सम्मान पदक मिला. किसी को यह मालूम नहीं था कि गवर्नर यह करने वाले हैं इसलिए सब कुछ चकित से रह गये. मुझे भी बहुत अच्छा लगा.

फ़िर हम लोग तराईलान के अस्पताल को देखने गये जहाँ जिले के विकलांग बच्चों के माता पिता से मिलने का कार्यक्रम था. वहाँ पहुँचे थे तो थोड़ी गर्मी लग रही थी. मीटंग के बाद तीन घँटे के बाद अस्पताल से बाहर निकले तो चकित रह गये, तूफान और बारिश आ रहे थे, अस्पताल के पीछे वाला पहाड़ बर्फ से ढक गया था.

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दोपहर में वापस उलानगोम पहुँचे तो मालूम हुआ कि भारत से दलाईलामा द्वारा भेजा विषेश प्रतिनिधी लामा आ रहे हैं जो प्रार्थना सभा करेंगे. हालाँकि बारिश आ रही थी और सर्दी लग रही थी फ़िर भी सब वहाँ जाना चाहते थे, क्योंकि मँगोलिया में तिब्बती बुद्ध धर्म को माना जाता है और दलाई लामा जी यहाँ के लिए सबसे बड़े धार्मिक गुरु माने जाते हैं. बुद्ध धर्म मँगोलिया में केवल सोलहवीं सदी में आया पर अब यहाँ की अधिकाँश जनता बुद्ध धर्म में विश्वास करती है हालाँकि साथ साथ प्राकृति पूजा में भी विश्वास करती है. बुद्ध प्रार्थना सभा का आयोजन एक स्टेडियम में किया गया था. बारिश में हरी घास पर बुद्ध लामाओं की लाल पौशाकें बहुत सुंदर लग रही थीं. प्रार्थना के बाद हमें भी दलाई लामा जी के द्वारा भेजा प्रसाद मिला, जो मैंने कुछ इटली में घर ले जाने के लिए संभाल कर रख लिया.

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दोपहर का खाना खाते खाते चार बजने लगे थे, फ़िर हम लोग गये करीब बीस किलोमीटर दूर उव्स झील देखने. उलानगोम शहर के उत्तर में एक पहाड़ी है, उसके ऊपर चढ़ो तो बीस किलोमीटर दूर झील स्पष्ट दिखती है. बीस किलोमीटर तक सपाट पठार है, कोई पेड़ पौधा नहीं, बस केवल घास और दूर दूर बिखरे गिने चुने लोगों के रहने के तम्बू, जिन्हें यहां की भाषा में गेर कहते हैं. उव्स झील मँगोलिया की सबसे बड़ी झील है और इसका उत्तरी किनारा मँगोलिया तथा रूस के बीच सीमारेखा बन जाता है. सीमा पार करो तो रूस में साईबेरिया के दक्षिणी भाग का ताईगा मिलता है जहाँ तूवा जाति के लोग रहते हैं. उलानगोम में कहते हें कि कुछ मँगोली चोरों की मदद से तूवा डाकू बार बार मँगोलिया में घुस आते हैं, जानवर विषेशकर घोड़े चुरा लेते हैं, लोगों को मार देते हैं जिसकी वजह से यहां अपराध बढ़ रहे हैं और असुरक्षा की भावना भी बढ़ रही है. सीमा क्षेत्र में रहने वाले मँगोली पशुपालक चोरों से बचने के लिए बंदूके रखने लगे हैं. सुना तो थोड़ा आश्चर्य भी हुआ और दुख भी. देखने में शांत और सुंदर, थोड़े से मुट्ठी भर लोगों से बसा यह क्षेत्र भी खून खराबे से नहीं बच पा रहा.

झील देखने में सागर सी लगती है क्योंकि उसका छोर आँखों को नहीं दिखता. करीब सत्तर किलोमीटर लम्बी और साठ किलोमीटर चौड़ी फ़ैली झील समुद्र से कम नहीं. झील के दक्षिण पश्चिम की ओर ऊँचे बर्फ से ढके पहाड़ हैं, जिनमें से सबसे ऊँचा पहाड़ की ऊँचाई चार हज़ार मीटर से अधिक है. देखने के लिए बहुत पक्षी हैं और प्राकृतिक सुंदरता. करीब का सबसे बड़ा शहर है उलानगोम जहाँ से पर्यटक यहाँ आते हैं पर जिस समय हम लोग वहां गये, उस समय चार पांच कारें ही थी पूरी झील पर. बस, इतने बड़े कई सौ मील लम्बे क्षेत्र में पंद्रह बीस पर्यटक, न कोई रेस्टोरेंट, न कोई नावें, केवल प्रकृति.

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हम लोग थोड़ी देर रुके तो मेरे मँगोली साथियों ने साथ लाये डिब्बे खोले. वह लोग खाने के लिए उबला मीट ले कर आये थे और पीने के लिए वोदका. उबले मीट की बड़ी बड़ी हड्डियां देख कर मेरी तबियत खराब होने लगती है और समझ नहीं पाता कि कैसे यह लोग इस तरह की चीज़ को इतने उत्साह से और आनंद से खाते हैं. खैर यह बात उनसे कहने की नहीं थी, बोला कि मुझे भूख नहीं. वोदका को होठों से छूने का एक दो बार दिखावा किया तो मुझे झँझट से छुट्टी मिली.

फ़िर शुरु हुआ गाना गाने का दौर. अंतहीन आसमान के नीचे, अंतहीन धरती पर ले कर घूमते चरवाहों के गीत. उव्स राज्य के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी डा. दोज़गाटोव साथ थे, जब उन्होंने गाया तो मैंने तुरंत रिकार्डर चलाया. वे बहुत बढ़िया गाते हैं और शब्दों के अर्थ न समझते हुए भी बहुत आनंद आया.

तब तक हमारे आसपास झील पर पाये जाने वाले कई तरह के पक्षी एकत्रित हो चुके थे, विषेशकर सीगल, बचेखचे मीट हड्डियों को पाने की चाह में. कई दशक पहले बाख की किताब पढ़ी थी "जोनाथन लिविंगस्टन सीगल", तब यह पक्षी मुझे बहुत अच्छे लगते हें हालांकि उनका शोर मचाना और आपस में झगड़ना अच्छा नहीं लगता. साथियों ने बचा हुआ माँस और हडि्डियां फैंकी तो पक्षियों के झुंड उन पर टूट पड़े.

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आखिरकार वापस शहर की और चले तो पहाड़ी की चोटी पर बने औवो पर रुके, वहां लगे पत्थरों के चक्कर लगाये और प्रार्थना की. तब तक साथियों ने वोदका की एक अन्य बोतल खोल ली थी. यानि कुछ भी बात हो यहां तो बस पीने का बहाना चाहिये. पुरुष है या स्त्री, सभी लग जाते हैं. जब शुरु करते हैं तो मुझे लगता है कि इतनी बड़ी बोतल कैसे पूरी समाप्त करेंगे, क्योंकि जब तक बोतल समाप्त नहीं होगी, वहां से जा नहीं सकते. पर करते करते सभी बोतले समाप्त हो जाती हैं.

फ़िर पहाड़ी पर बने बुद्ध कब्रिस्तान पर मैंने कुछ तस्वीरें खींची और वापस होटल आ गये. कल सुबह वापस उलान बातार जाने की उड़ान है.

15 जून 2008, उलान बातार, रात नौ बजे

कल तो सारा दिन हवाई अड्डे के चक्करों में ही निकल गया. सुबह मालूम चला कि हमारा जहाज उलान बातार से नहीं चला क्योंकि वहां मौसम ठीक नहीं है. दोपहर को आखिर कार उन्होंने कहा कि उड़ान अगले दिन, यानी 15 की सुबह को सात बजे होगी. आज सुबह फ़िर वही हाल, कि जहाज़ उलान बातार से नहीं चल पा रहा. आखिरकार बारह बजे के करीब समाचार मिला कि उलान बातार का मौसम कुछ सुधरा है और जहाज आने वाला है तो तुरंत वापस उलानगोम के हवाई अड्डे पर गये, सामान दिया और फ़िर डा. दोरज़गाटोव और अन्य लोगों के साथ वहां करीब ही लाल पहाड़ की ओर गये. पहाड़ की चढ़ाई अधिक नहीं थी पर हम यहाँ वैसे ही करीब दो हज़ार मीटर की ऊँचाई पर हैं इसलिए सांस जल्दी फ़ूलने लगता है.

पहाड़ के ऊपर पहुंच कर जैसा कि हर बार होता है, पहले औवो के चक्कर लगाये, पूजा की और फ़िर विदा लेने के लिए वोदका की बोतल निकाली गयी.

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थोड़ी देर में वापस हवाई अड्डे आ गये, क्योंकि जहाज के आने का समय हो गया था. हमारे पीछे वाली सीट पर भारत से आये दलाई लामा के प्रतिनिधि भी बैठे थे जिनकी प्रार्थना सभा में हम लोग गये थे. जब मैंने उनंहे बताया कि मैं दिल्ली से हूँ तो उनके साथ बैठे दूसरे लामा हिंदी में बात करने लगे. सारे रास्ते में जहाज से बादल और पहाड़ों पर गिरी बर्फ दिख रही थी. उलान बातार के पास पहुंचे तो छोटा सा जहाज तेज हवा में सूखे पत्ते की तरह हिलने लगा. जहाज में कई यात्रियों को मतली होने लगी. बहुत लोग डरे रहे थे कि क्या होगा पर कुछ नहीं हुआ और जहाज ठीक से उतर गया. उलान बातार के हवाई अड्डे पर धूल मिट्टी का तूफ़ान आ रहा था,सब कुछ कोहरे से ढका लगता था.

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होटल पहुंच कर मैं सबसे पहले नहाने गया और देर तक फुव्वारे के नीचे खड़ा रहा. नहाये हुए पांच या छः दिन जो हो गये थे. अब उल्गी और उलानगोम बहुत दूर लगते हैं. अब चार दिन यहाँ रुकना है, फ़िर बृहस्पतिवार को मंगोलिया के पूर्व में हैंतीई राज्य में जाना है.

18 जून 2008, उलान बातार, सुबह साढ़े छहः बजे

उलान बातार शहर में रेस्टोरेंट की कमी नहीं, दो तीन भारतीय रेस्टोरेंट भी हैं. कल रात का खाना यहीं करीब के ताजमहल रेस्टोरेंट में खाया, जिसे चलाते हैं केरल के श्री बाबू जो रेस्टोरेंट चलाने के साथ यहाँ होटल मेंनेजमैंट भी पढ़ाते हैं. इनके अलावा कोरियन, जापानी चीनी, चेक, रूसी, जर्मन, सभी तरह के रेस्टोरेंट मिल जाते हैं. एक दोपहर को कोरियन रेस्टोरेंट में भी खाना खाने गये जो मसालेदार और बढ़िया था.

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पूरे मँगोलिया की आबादी करीब 24 लाख है जिसमें से 10 लाख से अधिक लोग उलान बातार शहर में रहते हैं. पिछले कुछ सालों में सर्दी अधिक पड़ रही है, लाखों पशु मर जाते हैं और पशुपालने वाले परिवार अचानक अपनी सारी सम्पत्ती खो कर गरीब हो जाते हैं और शहर आ जाते हें जीवन बिताने. उलान बातार आने वाले परिवारों को सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है कि वे कहाँ रहें, पर घर बनाने के लिए जमीन सबको मुफ्त मिलती है, वहीं तम्बु वाला घर बना लेते हैं. कल दोपहर को इसी तरह के गावों से आने वाले शरणार्थियों से बसा उपनगर बायनज़ुर्ख देखने का मौका मिला. भारत में इस तरह कि जगहों को झोपड़पट्टी ही कहा जायेगा पर यहाँ पर हर घर को खुली जगह मिलने से, गरीबी कम भीषण लगती है. उलान बातार शहर एक लम्बी व तंग घाटी में है, जिसके दोनो ओर पहाड़ियाँ हैं. पहले सारे घर नीचे वादी में ही थे, पुराने रूसी तकनीक से बने कई मँजिला बम्बई की चालों जैसे घर. अब नीचे वाली वादी में कुछ नये घर बने हैं जो देखने में अच्छे हैं, जिनका निर्माण अच्छे तरीके से किया गया है पर वह बहुत मँहगे हैं, जबकि गावों से यहाँ आने वाले लोगों को जगह मिलती है पहाड़ियों पर, जहाँ बसें नहीं जाती और हर तरफ फैले हुए घर और तम्बु दिखते हैं. बायनज़ुर्ख उपनगर पहले अपने कब्रिस्तानों के लिए जाना जाता था, नीचे शहर के पास बना बड़े और प्रसिद्ध लोगों का छोटा कब्रिस्तान जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री, नेता इत्यादि दफन किये जाते हें और ऊपर पहाड़ी पर दूर जा कर बना आम लोगों का कब्रिस्तान. अब कब्रिस्तानों के सारा रास्ता घरों से ठसा ठस भर गया है.

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उलान बातार छः उपनगरों में बँटा है, एक केंद्रीय उपनगर जहाँ मुख्य शहर है और जिसमें दो लाख लोग रहते हें और आसपास के पाँच अन्य उपनगर जिन्हें शहर के हाशिये के किनारे पर. देखो तो भारत के मुकाबले सब कुछ बहुत कम विकसित लगता है, पर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं की दृष्टि से देखा जाये तो भारत से बहुत आगे है. हर पाँच या दस हजार लोगों के लिए साधारण बीमारियों का इलाज करने के लिए डाक्टर है, जहाँ इलाज मुफ्त मिल जाता है. हालाँकि देश में विभिन्न चिकित्सा विषेशज्ञ नहीं, जितनी तरक्की भारत में इस क्षेत्र में है, उसका दसवां हिस्सा भी नहीं पर मुझे लगता है कि भारत का सारा विकास पैसे के ऊपर निर्भर है, अगर आप के पास पैसा है तो कुछ भी इलाज करवा लो, अच्छे से अच्छे स्कूल में पढ़ लो, और गरीब हो तो कुछ भी नहीं, केवल सरकारी अस्पताल हैं जहाँ अक्सर मानवीय बर्ताव नहीं मिलता है.

आज सुबह उलान बातार विश्वविद्यालय के चिकित्सा और विज्ञान विभाग में एक मीटिंग है. रात को एक मँगोली साथी ने अपने घर खाने पर बुलाया है. और कल सुबह सुबह तो यात्रा पर निकलना है.

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20 जून 2008, ओनडोरहान, सुबह सात बजे

कल रात को ओनडोरहान या ओनडोरखान शहर पहुँचे. मेरे विचार में जैसे सिरिल्क वर्ण में शहर का नाम लिखा जाता है, उससे "खा" की आवाज़ बनती है पर बहुत से लोग इसे "ह" की ध्वनि देते हैं. इसी तरह समझ नहीं आता कि इस राज्य का नाम हिन्टिई है या खिन्टिई. पर अँग्रेजी की अखबार में इसे Khintii लिखा देखा. इस सब कन्फ्यूज़न की वजह है कि मँगोली भाषा अपनी वर्णमाला का प्रयोग नहीं करती बल्कि उसे रूसी सिरिल्क वर्णमाला में लिखा जाता है. आज पुरानी मँगोली वर्णमाला कुछ उसी तरह पढ़ाई जाती है जैसे भारत में संस्कृत, यानि आम जीवन से उसका कोई सम्बंध नहीं. पिछली सदी में 1920 के आसपास मँगोलिया रूसी प्रभाव में आया तो फ़िर सत्तर सालों तक वह प्रभाव रहा. यहाँ के बहुत से प्रोफेसर, वकील, डाक्टर, सब रूस में शिक्षा पाये हैं इसलिए रूसी प्रभाव से निकलना आसान भी नहीं.

तुलगम्मा, मेरी मँगोली साथी बता रही थी कि कुछ साल पहले तक यहाँ केवल तम्बु और चरवाहे दिखते थे, गिनी चुने सरकारी भवन ही पक्के बने होते थे. जबकि कल जब हम लोग पहुँचे तो कई काराओके बार, पब, रेस्टोरेंट और होटल दिखे. तुम्बु वाले घर तो गिने चुने ही दिखते हैं, जिनके पक्के घर नहीं उन्होंने भी टीन की छत डाल कर झोपड़ियाँ सी बना ली हैं. शहर का केन्द्र है गवर्नर का कार्यालय जिसके सामने नया रंगीन, पानी की धार को बदलने वाला फुव्वारा बनाया गया है और साथ में चँगेज़ खान की भव्य मूर्ती भी है. चँगेंज़खान जिन्हें यहाँ के लोग चिगिंज़खान कहते हैं, का जन्म खिन्टिई राज्य में हुआ था और उन्हें मँगोलिया का सबसे बड़ा हीरो माना जाता है क्योंकि उन्होंने मँगोली राज्य को यूरोप तक फैलाया था. हालाँकि पश्चिमी इतिहास पुस्तकें चँगेजखान को बर्बर और खूनी मानती हैं, मँगोली लोगों में उसकी छवि कुछ वैसी ही है जैसी भारत में सम्राट अशोक की है. उनका कहना है कि चँगेज़खान खूले विचारों का था, उसके दरबार में देश विदेश के विद्वान इक्ट्ठे होते थे, वह सभी धर्मों को बराबर मान देता था, इत्यादि.

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अगली 29 जून को मँगोलिया में राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं. हर तरफ चुनावों के विज्ञापन बोर्ड दिखते हैं. दो प्रमुख पार्टयाँ हैं, डेमोक्रेटिक और रिवोल्यूशनरी, यानि जनताँत्रिक और क्राँतीकारी दल. क्राँतीकारी दल पुराना कम्यूनिस्ट पार्टी का है जिसने पिछली सदी में रूसी प्रभाव में बड़ी कठोरता और निर्ममता से शासन किया था. कहते हैं कि उलान बातार के पास 30 हज़ार कब्रें मिलीं थीं जो उस शासन के विरोधियों की थी़. 1992 में जब मँगोलिया रूसी प्रभाव से निकला तो जनताँत्रिक पार्टी ने चुनाव जीते थे पर कुछ ही वर्षों में उदारीकरण और भूमण्डलिकरण के प्रभाव ने बहुत से गरीब मँगोलियों का जीवन कठिन कर दिया और वह लोग वापस क्राँतिकारी दल की ओर लौट गये हैं. खैर चुनावों की धूमधाम का मतलब है कि हर तरफ लोग अपने अपने उम्मीदवार के लिए तम्बु लगाये बैठे हैं, या फ़िर नारे लगा रहे हैं या कारों में लाऊडस्पीकरों से एलान कर रहे हैं.

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दो दिन रुकना है यहाँ ओनडोरखान में. रविवार को वापस उलान बातार जाना है. मँगोलिया की यह यात्रा अपने अंतिम चरण में है. थोड़ी थकान होने लगी है. कल जब उलान बातार से खिन्टिई की ओर आ रहे थे तो रास्ते में पहाड़, घोड़े, भेड़, बकरियाँ देख कर उतना उत्साह नहीं हो रहा था जैसे कि शुरु में उल्गीई जा कर हुआ था. यहाँ जुनोन होटल में ठहरे हैं. जो कमरा मिला है वह सारा गुलाबी और लाल रंग से सजा है. लाल सोफा, गुलाबी बिस्तर, गुलाबी साबुनदानी. लगता है कि करण जौहर की फ़िल्म के सेट में रह रहा हूँ. बिस्तर के ऊपर, दीपर पर चंगेज़खान की तस्वीर टँगी है.

आज तो शहर में ही रहेंगे. कल कहीं करीब के गाँव की ओर जायेंगे. खिन्टिई राज्य में बुरियत जनजाति रहती है जहाँ के लोग शराब पीने और आराम करने के लिए प्रसिद्ध हैं. यहाँ के स्वास्थ्य विभाग ने सुझाव दिया कि बुरियत जनजाति के गाँवों की ओर जाना चाहिये. पहले तो बहुत खुशी हुई कि नयी जनजाति देखने का मौका मिलेगा पर जब मालूम चला कि वह गाँव दो सौ किलोमीटर दूर है और रास्ता कच्ची सड़क है तो अपनी कमर का सोचना पड़ा जो रोज़ के धक्कों से दर्द करने लगी है और अंत में यही निर्णय हुआ कि बुरियत जाति को फ़िर कभी देखा जायेगा, इस बार तो करीब का ही कोई गाँव देखना बहुत है.

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