सीमाहीन आसमान मँगोलिया यात्रा की डायरी सुनील दीपक 6 जुलाई 2008

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Mongolia, Bayan Ulgii

21 जून 2008, ओनडोरहान, सुबह पाँच बजे

आज जिस गाँव को देखने जाना है उसका नाम है "बायानओवो", जो ओनडोरहान से 130 किलोमीटर दूर है. मुझे यह समझ में नहीं आया कि इस गाँव में भी बुरियत जनजाति के लोग रहते हैं या नहीं. सोचा तो था कि आसपास के पंद्रह बीस किलोमीटर दूर तक कोई गांव देखा जायेगा पर राज्य के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी नहीं माने. वह स्वयं भी बुरियत जनजाति से हैं और सर्जन हैं. बहुत बातें करते हैं और बीच में किसी अन्य को बोलने का मौका कम ही देते हैं. कल रात को उन्होंने यहां के एक रेस्टोरेंट में खाने पर बुलाया था. बताने लगे कि उनकी शिक्षा रूस में लेनिनग्राद में हुई है जहाँ उनके साथ बहुत से क्यूबन साथी थे जिनके साथ उन्होंने स्पेनिश भाषा बोलना सीखा. जब मैंने स्पेनिश में उन्हें उत्तर दिया तो उनकी बाँछें खिल गयीं, जो बोलना शुरु किया करीब दो घँटे तक, रुके नहीं. कुछ स्पेनिश में बोल रहे थे और जब कुछ शब्द याद न आते तो मँगोली भाषा में बोलते. साथ साथ वोदका के गिलास उतार रहे थे. थोड़ी देर में ही बात उनके सेक्सुअल पावर यानि यौन शक्ति पर आ गयी कि जवानी में उन्होंने किस किस देश की युवतियों के साथ यौन सम्बंध किये और कैसे लड़कियाँ उनके पीछे भागती थीं. नशा अधिक चढ़ा तो स्पेनिश में बात करना बंद हो गया और मँगोली भाषा में ही बोल रहे थे जिसे मेरी अनुवादक मुझे अंग्रेजी में बताती थी.

मँगोलिया में सेक्स के विषय पर लगता है कि स्त्री और पुरुष पश्चिमी स्वच्छंदता से बात करते हैं, यह बात तो पहले भी कई बार देख चुका था पर फ़िर भी मिले जुले स्त्री पुरुष समूह में जिसमें छोटी उम्र की युवतियाँ भी हों, इस तरह की बात हो तो अंदर से कुछ अजीब सा लगता है, हालाँकि मेरी अनुवादक सर्जन साहब की बातें सहजता से मुझे अनुवाद करके बता रही थी. बोले कि हालाँकि उन्हें किसी भारतीय स्त्री के साथ संसर्ग का मौका नहीं मिला, पर जहाँ तक उनका अनुभव है दुनिया की सभी औरतें मँगोली पुरुष को पसंद करती हैं क्योंकि उसका पुरुष अंग हमेशा तना रहता है, कभी ढीला नहीं पड़ता और पूछने लगे कि मेरा इस बारे में क्या विचार है. मैंने कहा कि आजकल वियाग्रा की गोली से यह बात किसी भी पुरुष के लिए आसान है और इसमें मँगोली पुरुष की प्रसिद्ध की बात मैंने तो नहीं सुनी, तो वह थोड़ा नाराज हो गये.

मँगोली पुरुष देख कर मन में कई बार "मार्लबोरो मैन" मन में आता है. सिर पर हैट पहने, घोड़े पर बैठे, होठों से लटकती सिगरेट, लगता है कि किसी अमरीकी वेस्टर्न फिल्म से निकल कर आये हों. पर जब नशे में चूर मिलते हैं तो ज़रा सा डर भी लगता है. जितनी बार भी विकलांग लोगों से मुलाकात होती है हर बार कोई न कोई तो पुरुष अवश्य मिलता है जिसके हाथ या उँगलियाँ कटी हुई हों, जो सर्दी में जम जाने की वजह से होता है. हर बार वह लोग कहानी सुनाते हैं कि घोड़े से गिर गया, या फ़िर एक्सीडेंट हो गया या कि डाकू ने हमला कर दिया, पर मुझे लगता है कि वह लोग झूठ कह रहे हैं, अधिक पीने की वजह से रात को कहीं बाहर गिरे पड़े रहे होंगे जब सर्दी से हाथ जम गये और काटने पड़े होंगे! खैर सर्जन साहब को झेलना आसान नहीं था. जितना पीते जा रहे थे, उतना ही अधिक बोल रहे थे. आखिरकार जब रेस्टोरेंट से उठे तो सिर में दर्द हो रहा था.

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22 जून 2008, ओनडोरहान सुबह सात बजे

कल बायनओवो की यात्रा बड़ी रोमांचकारी थी. तेज बारिश आ रही थी और पहाड़ियों के बीच ढलानों पर सारा पानी इकट्ठा हो कर नदियाँ सी बना रहा था. उस पर कच्चा रास्ता. ओनडोरहान से बायनओवो के 130 किलोमीटर तय करने में चार घँटे लगे. दो बार गाड़ी कीचड़ में फिसल गयी पर दोनो जगह पठार में थीं और कुछ खतरा नहीं था. रास्ते में कई गाड़ियाँ, ट्रक, आदि कीचड़ में फँसे या कोई अन्य खराबी से रुके दिखते. कई बार हम लोग रुके अन्य लोगों की गाड़ियाँ कीचड़ से निकलवाने की मदद करने.

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बायनओवो छोटा सा गांव हैं, थोड़े से घर, एक स्कूल, एक अस्पताल, एक पोस्टओफिस. पिछली 24 मई में यहाँ भयंकर तूफान आया था, पहले रेत आयी, फ़िर बर्फ. घरों की छते उखड़ गयीं, जानवर बाहर ही जम गये. बायनओवो की ग्रामप्रधान बोली कि करीब 3 लाख मवेशी मर गये, अधिकतर घोड़े. अस्पताल की छत भी उसी तूफ़ान में बिगड़ी थी और भीतर कई जगहों पर छत से पानी चू रहा था.

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अधिक देर नहीं रुके. दो तीन घँटों में काम पूरा हो गया तो वापस चले और वापस आने का रास्ता तो और भी लम्बा लगा, क्योंकि इस बीच बारिश रुकी नहीं थी, जहाँ पहले नदियां दिखती थीं, वहां अब झीलें दिख रहीं थीं. रात को आठ बजे वापस ओनडोरहान पहुंचे तो शहर के गवर्नर ने खाने की दावत दी थी. वही मीट के ढेर देख कर मेरा तो जी घबराने लगा, पर फ़िर शायद उन्हें मुझ पर दया आ गयी, बोले मेरे लिए विषेश आमलेट बनाया गया है.

आज अभी थोड़ी देर में उलान बातार के लिए रवाना होना है, बाहर बारिश वैसे ही लगातार चल रही है. रास्ते के पहले 30 किलोमीटर कच्ची सड़क पर हैं, उसी में दिक्कत होगी, बाकि का रास्ता तो पक्की सड़क पर है, दिक्कत नहीं होनी चाहिये. लोग कह रहे हैं कि हमारा आना सौभाग्यशाली रहा, आठ साल के बाद इतनी बारिश हुई है.

23 जून 2008, उलान बातार, सुबह सवा पांच बजे

आज सुबह चार बजे ही आँख खुल गयी, बहुत कोशिश की पर दोबारा नींद नहीं आयी. कल रात को करीब के उलान बातार होटल में स्थित ताज महल भारतीय रेस्टोरेंट का खाना खाया था. खाना अच्छा नहीं था, और रात को पेट में कुछ दर्द भी था. बहुत देर तक तो करवट बदलता रहा, फ़िर आखिरकार सोचा कि उठ कर काम करना ही बेहतर है. यह मंगोलिया यात्रा अब अपने अंतिम चरण पर है. आज सुबह साढ़े नौ बजे एक मीटिंग है, दोपहर को गंडाम बुद्ध मंदिर जाने का कार्यक्रम है और शाम को मँगोलिया के पाराम्परिक नृत्य संगीत के एक कार्यक्रम में जाने की सोची है.

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कल सुबह ओनडोरहान से चलते चलते ग्यारह बज गये थे. सुबह सुबह वहां के अस्पताल की डा. अरूना ताज़ी क्रीम की बोतल और साथ में बुरयित जनजाति कि विषेश डबलरोटी ले कर आ गयी थीं. कमरे में हम सब लोग देर तक काफी पीते रहे, नाश्ता करते रहे और गप्प मारते रहे. मैंने अपने कम्प्यूटर पर ओनडोरहान के तीन दिनों में खींची तस्वीरें दिखायीं. मुझे अरुना बहुत अच्छी लगी, शायद कुछ भारतीय लगने वाले नाम की वजह से और कुछ उनके हँसमुख सौम्य स्वभाव की वजह से. बात बात पर हा हा करके खुल कर हँसती हैं वह, पर साथ ही अस्पताल में मरीजों के पीछे दिन रात जान मारती हैं. जीप में जब भी अरुना के साथ यात्रा की, तो देखा कि जीप में बैठते ही तुरंत आँखें बंद करके सो जाती. चलने लगे तो शर्माती हुई बोलीं कि मेरे लिए एक छोटी सी भेंट है, एक आयल पैंटिंग जो उनकी एक सहेली के पति ने बनायी है. पैंटिंग बहुत सुंदर तकनीक से न बनी हो कर भी बहुत सुंदर है क्योंकि मंगोलियन प्रकृति और इन दिनो में देखे मँगोली रंगो को अच्छा दिखाती है. दिक्कत है कि इतनी बड़ी है और इतना चौड़ा फ्रेम है कि उसे इस तरह से साथ ले जाना बहुत कठिन है. अंत में यहाँ के आफिस वालों से कहा है कि उसका फ्रेम निकाल दें और पीछे लगी लकड़ी भी हटा दें, खाली केनवास रह जायेगा उसे लपेट कर ले जाना आसान होगा और घर जा कर दोबारा फ्रेम बनवा लूँगा.

कल सुबह ओनडोरहान में चले तो बारिश आ रही थी, रास्ते भर बारिश आती रही, यहाँ उलान बातार में भी बारिश आ रही थी और सारी रात पानी बरसता रहा, अब भी बरस रहा है. टुकी, हमारी मंगोली साथी कह रही थी कि मंगोलिया में अधिक बारिश नहीं आती, अगर हो भी तो थोड़ी देर में रुक जाती है. पर इस बारिश को देख कर लगता है कि शायद यहां भी मौसम बदल रहा है? कल रास्ते में उलान बातार से करीब बीस पच्चीस किलोमीटर दूर छिंग्गिस हान यानी चँगेज़खान की एक विशाल मूर्ती देखने रुके. यह अभी पूरी नहीं बनी पर बहुत भव्य है. नैयमा, हमारी साथी जो यहाँ की एक ट्रेवेल एजेंसी में काम करती हैं कह रही थीं कि यह मूर्ती न्यू योर्क की स्टेयू ओफ लिबर्टी से प्रभावित है. नीचे दो मंजिला गोल भवन बना है, जिसके अंदर एक तीसरा तला धरती के स्तर से नीचे है. अंदर लिफ्ट हैं जिनसे और घोड़े पर बैठे चंगेज़खान की कमर तक पहुँचेंगे और जहाँ घोड़े की काठी पर बने एक दरवाजे से निकल कर घोड़े की गर्दन पर चलते हुए उसके सिर तक पहुँचेगे जहाँ से नीचे की घाटी और बर्फ से ढके पहाड़ों का विहंगम दृश्य नज़र आयेगा.

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मूर्ती के पास खड़े एक सिक्योरिटी गार्ड ने कहा कि चालिस डालर दे कर चाहें तो वह हमें चंगेज़ खान की मूर्ती के अंदर तक घुमा सकता है पर मुझे लगा कि यह तो बहुत मँहगा है और मना कर दिया.

नैयमा का कहना है कि मँगोली भाषा में जब kh लिखा जाता है तो उसे "ह" पढ़ना चाहिये न कि "ख" और इसलिए चंगेज़ खान का सही नाम है चँगेज हान यानि चंगेज़ राजा. कहीं भी जाओ, नैयमा गाईड पुस्तिका की तरह शुरु हो जाती है उसके बारे में वह सब बातें जो उनके विचार में पर्यटकों को जाननी चाहिये, कई बार लगता है कि बहुत बोलती है, कुछ कम बोलना चाहिये, फ़िर सोचता हूँ कि अगर बोलें न तो अपना ट्रेवल एजेंसी का काम केसे करेंगी!

यात्रा में बात हो रही थी मंगोली पाराम्परिक विश्वासों की. टुकी ने कहा कि मँगोली लोग प्रकृति को छेड़ना ठीक नहीं समझते. यानि किसी भी जगह जाओ, वहां के पत्थर, पौधों आदि को बिना वजह न छेड़ो और न ही वहां से कोई चीज़ उठा कर अपने साथ लाओ, और अगर कोई इस नियम को नहीं मानता तो उसके साथ बुरा होता है. अपनी बात को साबित करने के लिए उन्होंने दो कहानियां सुनाई जिसमें लोग कहीं घूमने गये तो वहाँ से पत्थर उया लाये जिनसे उनका बहुत बुरा हुआ, कार में चायर पंक्चर हो गया, गाड़ी में खराबी आ गयी, बीमार हो गये, इत्यादि, और बाद में उन्हें प्रकृति से क्षमा माँगने की पूजा करनी पड़ी तब जा कर प्रकृति शांत हुई. इस तरह की बात को अंधविश्वास कह सकते हैं पर मुझे लगा कि मानव की इस तरह की सोच प्रकृति के सम्मान और सुरक्षा की भावना को व्यक्त करती है हालांकि आज का मंगोलिया अपने आर्थिक विकास के लिए जिस तरह खानें खोद रहा है, और वह खानें भी विदेशी मल्टीनेशनल ही चलाती हैं, उनसे प्रकृति नष्ट हो रही है उससे लगता है कि आज इस तरह का सोचने वाले कम हैं.

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फ़िर नैयमा सुनाने लगी प्राचीन बुद्ध कथाएँ. एक कहानी सुनाई दस महाकालों की, जिनमें से नौ महाकाल पुरुष थे और एक महाकाल स्त्री थी. बुद्ध ने नौ महाकालों से कहा कि वे दानवों के राजा से लड़ें और उसे मार दें. नौ महाकाल अपनी सारी शक्ति के बावजूद दानवराज को न मार सके और हार कर वापस बुद्ध के पास लौट आये. फ़िर बुद्ध ने दानवराज से लड़ने स्त्री महाकाल को भेजा जो सुंदर कन्या बन गयी, दानवराज को रिझा लिया और उससे विवाह कर लिया. विवाह के एक वर्ष के बाद उनके कन्या पैदा हुई, तब तक दानवराज पत्नी पर विश्वास करने लगा था. तब पत्नी बनी स्त्री महाकाल ने दानवराज को विष दे कर मार दिया और दांत से गरदन काट कर दानवराज से उत्पन्न बेटी को मार कर खून से सना मुख ले कर बुद्ध के पास आयी. बुद्ध ने कहा कि शक्ति और साहस ही सब कुछ नहीं चालाकी और दिमाग उनसे भी ऊपर हैं.

इस कहानी को सुन कर मन में बहुत सी भिन्न बातें आयीं. एक तो यह कि महात्मा बुद्ध अन्य देवी देवताओं की बात नहीं करते थे लेकिन शायद जब धर्म धीरे धीरे फ़ैला तो हर जगह की स्थानीय की कहानियाँ और विश्वास उसी धर्म में आत्मसात हो गये? दूसरी यह कि शायद यह कहानी काली और महिषासुर की कहानी का ही एक रूप है और यह कहानी भारत से ही बुद्ध धर्म के साथ आयी? तीसरी इस कहानी के भीतर छपे संदेश की बात कि चाहे साहस, वीरता हों या छल, कपट, हत्या, सब कुछ सही माना जा सकता है बस आप का लक्ष्य और उदेश्य ठीक होना चाहिये, तो इस सोच में और आतंकवादियों की सोच में क्या अंतर है?

24 जून 2008, उलान बातार, सुबह आठ बजे

कल दोपहर का खाना एक कोरियन रेस्टोरेंट में खाने गये. मुझे उनका खाने की मेज़ पर ही अंगीठी या गैस जला कर खाना बनाने का तरीका अच्छा लगता है. साथ ही उनका मिर्ची वाला बंद गोभी का सूप जिसे खिमची कहते हैं, वह भी अच्छा लगता है. और खाने के लिए छोटी प्लेटों या कटोरियों में विभिन्न खट्टे, मीठे, मिर्च वाले, सादे से विभिन्न तरह की चटनियां, सब्जियाँ थोड़ी थोड़ी देना ताकि बीच बीच में आप स्वाद बदलते रहे, वह भी अच्छा लगता है. शाम को टीवी देखने लगो तो यहाँ स्थानीय मँगोली चैनलों के अतिरिक्त सभी चैनल अधिकतर रूसी भाषा वाली हैं, बस एक कोरियन चैनल है अरिरंग (Arirang) जिसमें सभी कार्यक्रमों के अंग्रेजी में सबटाईटल होते हैं, वे भी देखना अच्छा लगा, उनके सीरियल भी भारतीय सीरियलों की तरह रोने धोने वाले नाटकीय होते हैं.

दोपहर को बाल कटवाने के लिए मेरी मंगोली साथी टुकी मुझे यहाँ के प्रसिद्ध बाल काटने वाले के पास ले गयी जहां मंगोलिया के जाने माने लोग बाल कटवाते हैं. मेरे बाल काटने वाला लड़का छोटी उम्र का था, उसके अपने बाल सफेद भूरे से रंगे थे और वह किसी वीडियोगेम से निकला लगता था.

फ़िर हम लोग गंडाम बुद्ध मंदिर देखने गये, जो अब पहले की अपेक्षा बहुत बदल गया है, वहाँ लोग बहुत जाते हें, आस पास बहुत से नये स्तूप बने हैं. टुकी कह रही थी कि 1938 में उसके दादा जी जो कि एक लामा थे, उनको भी तानाशाह सरकार ने मार दिया था पर इस बारे में घर में कोई कभी बात नहीं करता था. जब 1992 में रूसी मँगोलिया को छोड़ कर चले गये तो अपने दादा की बात उसे मालूम चली और उसकी दादी ने छुपाई हुई धार्मिक चीजें, मूर्तियाँ आदि बाहर निकालीं. पिछले वर्ष, अपने पिता के साथ मिल कर, टुकी और उसके भाई बहनों ने अपने दादा की स्मृति में अपने बुद्ध मंदिर में नया स्तूप बनवाया है.

गंडाम के भीतर एक पचास फुट ऊँची स्वर्णिम बुद्ध प्रतिमा है और बोद्धीसत्व की एक हज़ार छोटी छोटी मूर्तियां हैं. यहाँ बुद्ध धर्म की सारी पूजा तिब्बती भाषा में होती है जिसे लोग समझते नहीं. मंदिर के द्वार पर लिखे बुद्ध मंत्र "ओम नमो मणि पद्म हूँ" का अर्थ भी उन्हें नहीं मालूम था, बस केवल शब्दों को जानते थे. मंदिर में दलाई लामा की जवानी की एक तस्वीर भी थी. मुझे लगा कि धर्म की प्रार्थनाओं को केवल तिब्बती भाषा में कहना भी एक तरह का साम्राज्यवाद है और बुद्ध लामाओं को कोशिश करनी चाहिये कि सब प्रार्थनाओं का मंगोली भाषा में अनुवाद किया जाये जिससे लोग उन्हें समझ सकें.

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यहाँ कुछ लोगों को शिकायत करते सुना कि विभिन्न ईसाई पंथों के विदेशी मिशनरी यहाँ आ कर लोगों के धर्म बदलवा रहे हैं और धीरे धीरे बुद्ध धर्म वाले लोग कम हो रहे हैं. बुद्ध मंदिरों में भीड़ को देख कर ऐसा नहीं लगा कि बुद्ध धर्म खतरे में है पर अगर लोग अपने धर्म को समझ न पायें और उसे केवल विश्वास के रूप में बिना समझे स्वीकार करें, मेरे विचार में यह भी ठीक नहीं.

कल शाम को यहाँ के राष्ट्रीय नाटकघर में पाराम्परिक मँगोली नृत्य और संगीत सुनने का मौका भी मिला. मँगोली गायन पद्धति जिसमें पेट से धुम धुम करती सी ध्वनि निकाली जाती है या सीटी जैसी ध्वनि निकलती है, मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. मँगोली पाराम्परिक गायन कुछ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से मिलता है पर कुछ इतालवी ओपेरा से भी. चाहे वाद्य पाराम्परिक हों, पर उनको बजाने का तरीका पश्चिमी संगीत की सिम्फनी जैसे अंदाज़ में है और सारे स्वर लिखे हुए होते हैं.

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आज सुबह यहाँ अंतिम मीटिंग है, शाम को बेजिंग जाना है. यानि कि आज मंगोलिया यात्रा समाप्त जायेगी. कल दोपहर को बेजिंग में एक मीटिंग है और परसों यूरोप की ओर प्रस्थान होगा.

26 जून 2008, बेजिंग

उलान बातार से बेजिंग की यात्रा में अंत तक पता नहीं था कि जहाज़ जा पायेगा या नहीं. बहुत देर तक हवाई जहाज हवाई अड्डे पर खड़ा रहा था, कह रहे थे कि कोई तकनीकी कठिनाई थी. अंत में जब बेजिंग पहुँचे तो रात के गयारह बजे थे. कल दिन में एक मीटिंग थी यूरोपियन यूनियन के दफ्तर में. सुबह मेट्रो से कुछ घूमा, पहले वोकेसोंग का स्टेडयम देखा जो अभी पूरा नहीं हुआ और जहाँ ओलम्पिक इनडोर खेल होंगे. फ़िर बेजिंग मिल्लेनियम मेमोरियल देखने गया और अंत में तियानआमेन स्कावर्य में कुछ घूमा. बस इतना ही समय मिला घूमने का. रात को थकान हो रही थी, जम कर नींद आयी.

सुबह नाश्ते पर बंगलौर के सरस्वती ओनलाईन संस्था को चलाने वाले डा. बोस से मुलाकात हुई, जो चिकित्सा शास्त्र पढ़ना चाहने वाले भारतीय छात्रों को चीनी मेडिकल कालिजो में दाखिला दिलवाते हैं. कह रहे थे कि सब कोर्स अँग्रेजी भाषा में हैं और सालाना खर्चा करीब दस बारह लाख का पड़ता है जो कि भारतीय प्राईवेट मेडिकल कालिजों के सामने बहुत कम है. यानि की भारत के प्राईवेट मेडिकल कालिजों को भी चीन चुनौती देने लगेगा. अगर चीन इस तरह अँग्रेजी में पढ़ाने की क्षमता बना लेगा तो धीरे धीरे दुनिया में इस दिशा में अन्य देशों से भी छात्र बुला सकता है. अपने विज़िटिंग कार्ड पर वह स्वयं को मेडिकल कालेज का डीन लिखते हैं पर अंत में यह कमीशन ले कर छात्रों को दाखिला दिलाने का ही काम है.

बेजिंग सारा दिन धुँध में डूबा रहता है शायद वातावरण का प्रदूषण बहुत है. गर्मी, उमस और सारा दिन कोहरा सा छाया हुआ, कुछ कुछ दिल्ली की याद आती है हालाँकि पिछले कुछ सालों में दिल्ली में प्रदूषण कुछ कम लगता है. कल की यहाँ खींचीं तस्वीरें देखीं तो सबमें यही धुँध दिखती है. पर दिल्ली के मुकाबले यहाँ के टेक्सी वाले भले लगे. दिल्ली में तो हवाई अड्डे पहुँच कर लोगों की आपा धापी से बचना कठिन हो जाया है, पर यहाँ वैसा कुछ नहीं था. आराम से लाईन में खड़े हो कर अपनी टेक्सी का इंतज़ार किया. टेक्सीवाले ने होटल खोजने में मदद की और अंत में टेक्सी में लगे मीटर से रसीद छाप कर दे दी, किराये के लिए कुछ भी चिकचिक नहीं करनी पड़ी. फ़िर बेजिंग में कई बार टेक्सी ली, हर बार अनुभव इसी तरह सुखद हुआ.

बेजिंग की मैट्रौ भी बढ़िया है, सफ़ाई उत्यादि में दिल्ली की मैट्रो से कम नहीं. पांच छहः लाईने हैं मैट्रो की, हर जगह स्टेशन पर जानकारी स्पष्ट रूप से दी है कि किस तरफ़ जाना चाहिये, कहाँ उतरना चाहिये, कहाँ बदलना चाहिये. किराया भी एक फ्लेट रेट, यानि कहीं भी जाना हो बस दो युवान, यानि करीब दस रुपये. स्टेशन में घुसते समय या हवाई अड्डे में घुसते समय कुछ सिक्योरिटी चेक नहीं किया गया, यानि कि शहर में आतंकवाद का उतना डर नहीं.

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