मोज़ाम्बीक यात्रा की डायरी सुनील दीपक अप्रैल 2006

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03.04.2006

इस यात्रा का बिल्कुल भी मन नहीं था. परसों, शनिवार को ही लंदन से वापस आया, घर भी ठीक से नहीं गया और फ़िर रात देर तक एक मीटिंग में व्यस्त रहा, फ़िर कल रविवार को, मोजोम्बीक की यात्रा शुरु हो गयी. इतना थका हुआ था कि जहाज़ फ्रेंकफर्ट से जोहानस्बर्ग के लिए चला तो मैं तुरंत ही सो गया. साथ वाली सीट पर एक फ्रँसिसी वृद्ध से दम्पति बैठे थे, उन्होंने एक दो बार बाहर निकलने के लिए जगाया पर मैं उसके बाद दोबारा जल्दी से सो गया.

सुबह आँख खुली तो जहाज़ के टीवी पर एक फ़िल्म दिखा रहे थे, अधमुखी आँखों से उसे देख रहा था. फिल्म थी "लिजैंड आफ ज़ोरो" (ज़ोरो की दंतकथा). इयरफोन नहीं लगाया था पर छवि ही देख रहा था. एक क्षण के लिए लगा कि पुरानी राजेश खन्ना की कोई फिल्म हो, वैसे ही राजेश खन्ना के शराबी अंदाज़ में स्पेनिश मूल के अभिनेता अनतोनियो बन्देरास अभिनय कर रहे थे. थोड़ी देर बाद एक दृष्य आया जिसमें वे चर्च में जा कर जीसस की मूर्ती से जा कर वैसा ही डायलाग बोल रहे लग रहे थे जैसे अमिताभ बच्चन ने कितनी फिल्मों में बोला है, यानि, "भगवान, मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा...". कुछ और देर बाद दृष्य था रेलगाड़ी का और उसके पीछे दौड़ते बन्देरास यानि ज़ोरो का, लगा कि "शोले" फिल्म का रेलगाड़ी वाला दृष्य हो. मालूम नहीं यह मेरी थकान की वजह से था या नींद की वजह से फ़िल्म के हर दृष्य में मुझे किसी न किसी हिंदी फिल्म की याद आ रही थी.

जोहान्सबर्ग पहुँच कर करीब पाँच घँटा अगली उड़ान का इंतज़ार करना पड़ा. मोज़ाम्बीक की राजधानी मापूतो के हवाई अड्डे के बाहर मेरा इंतज़ार कर रहे थे, वहाँ रहने वाले हमारे साथी मासिमो. उनके घर पहुँचा तो शाम हो चुकी थी. जल्दी से खाना खाया और अब बस सोने की तैयारी है. मासिमो को रात को बहुत देर से सोने की आदत है और बहुत बोलता है, चुप ही नहीं करता पर मेरा ध्यान उसकी बातों पर रुक नहीं पाता, आँखें मुदने सी लगती हैं पर कमरे में पहुँचा तो सोचा कि तुरंत कुछ लिख लूँ फ़िर सोऊँ.

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04.04.2006

कल सुबह सुबह मापूतो से चले, देश के उत्तर में स्थित शहर नमपूला की ओर. जहाज रास्ते में बैइरा में रुका था. हम सबको ज़हाज से उतार दिया गया और बैइरा हवाईअड्डे पर कुछ देर इंतज़ार करना पड़ा.

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नमपूला करीब पंद्रह साल बाद वापस आया हूँ. पिछली बार आया था तो देश तभी बीस साल के युद्ध से निकला था, शहर में हर जगह लड़ाई के निशान दिखते थे. तब शहर के बाहर निकलना मुश्किल था क्योंकि सड़क पर दबे बम फटने का बहुत खतरा था.

अब शहर बिल्कुल बदल गया है, सड़क के दोनो ओर बहुत सी बड़ी दुकानें, होटल, रेस्टोरेंट आदि खुल गये हैं. पर फ़िर भी मुझे वह घर जहाँ पहली बार आने पर रुका था, पहचानने में कठिनाई नहीं हुई.

आते ही काम में लग गये हैं. यहाँ काम करने वाले हमारी सँस्था के लोगों में एक डाक्टर भी हैं, आन्ना, जिसके साथ काम करना है मुझे. आज सुबह से ही बहुत सी जगह देखने गये पर उनमे से दो जगह विषेश अच्छी लगीं. एक तो छोटे बच्चों का स्कूल जहाँ विकलाँग बच्चे भी पढ़ते हैं और जड़ी बूटियों से प्राकृतिक चिकित्सा का काम भी होता है. दूसरी जगह थी विधवा महिलाओं द्वारा चालित एक कोपरेटिव जहाँ वे महिलाँए पकौड़ों जैसी चीजें बना कर बेचती हैं. कुछ दिन पहले दीपा मेहता की फ़िल्म "जल" देखी थी जिसमें पिछली सदी की भारतीय विधवाओं का जीवन दिखाया गया था, यहाँ की विधवाओं की हालत भी कम बुरी नहीं. यहाँ भी पुरुष का परिवार, पति के मरने पर औरत को उसके बच्चों समेत घर से बाहर निकाल कर सम्पति हड़प कर जाने की कोशिश करता है.

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शाम को यहाँ की नयी दुकानों को देखने निकला तो पाया कि अधिकतर दुकानें भारतीय (या पाकिस्तानी) मूल के लोगों की हैं. हर जगह हर दुकान में वही बात, एक तरफ कैश काऊँटर पर बैठा दुकान का मालिक जो भारतीय या पाकिस्तानी मूल का है और दूसरी तरफ काम करने वाले सभी यहाँ के अफ्रीकी लोग. उस सड़क पर करीब 20 दुकानों में घुस कर देखा, हर जगह यही था. मन में आया कि अगर हम हिंदुस्तान में अंग्रेज़ो के शासन को बुरा मानते थे तो उसी तरह यहाँ के लोग भी भारतीय मूल के लोगों के बारे में भी महसूस करते होंगे. कुछ अच्छा नहीं लगा हालाँकि जब भारत में भी लोग जात पात को ले कर अपने भारतीय लोगों का शोषण करने में नहीं हिचकिचाते तो उन्हें अफ्रीकी लोगों का शोषण करता देख कर आश्चर्य क्यों ?

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रात को मुलाकात हुई दोमेनिको लुत्सी से, जो मोज़ाम्बीक के आज़ाद होने से पहले पादरी बनकर आये थे और यहाँ के स्वतंत्रता युद्ध में मोजोम्बीकी लोगों के साथ जुड़ गये. उन्हें चर्च वालों ने पादरी के पद से हटा दिया और मोज़ाम्बीक के पोर्तगीस शासकों ने मरवाने की कोशिश की. सारा जीवन उनका गरीब, हाशिये से बाहर शोषित मानव के विकास की कोशिश में गुज़रा है. बातों में उन्होने कई भारतीय मूल के लोगों के बारे में भी बताया जो उनके जीवन संघर्ष में उनके साथ रहे हैं. सुनकर थोड़ा संतोष हुआ कि भारतीय मूल के सभी लोग केवल लालच या पैसा के बारे में नहीं सोचते, किसी को गरीब मानव की भी फिक्र है.

06.04.2006

मुझे पोर्तगीस भाषा काम चलाने लायक ही आती थी. पर पिछले दो सालों में उसे इस्तमाल करने का कोई मौका नहीं मिला था. इसलिए मन में कुछ डर सा था कि जब पढ़ाना पड़ेगा तो ठीक से बोल पाऊँगा या नहीं, विद्यार्थी मेरी बात समझ पायेंगे या नहीं ? एक बार बोलना शुरु किया तो बहुत से भूले हुए शब्द याद आने लगे और दिन भर कुछ विषेश तकलीफ नहीं हुई. दिक्कत दूसरी थी, बहुत से गाँवों से आये पुराने कुष्ठ रोग से प्रभावित लोगों को पोर्तगीस भाषा नहीं समझ आती और उनके लिए हर बात उनकी मकूआ भाषा में अनुवाद करनी पड़ती थी. इसकी वजह से हर बात को पहले मैं धीरे धीरे बोलता और फिर एक विद्यार्थी उसे माकूआ में कहता और सारा कोर्स करने में सारा दिन निकल गया पर कोर्स पूरा नही हुआ. अंत में यह तय हुआ कि कल सुबह कक्षा एक घँटा पहले प्रारम्भ होगी, सुबह साढ़े सात बजे और मुझे होटल से सात बजे चलना पड़ेगा.

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दिन में कुछ समय खाली मिला तो मैं ट्रेनिंग सेंटर के पीछे की ओर एक पगडँडी पर घूमने निकल पड़ा. आधा घँटा चल कर एक गाँव में पहुँचा. बहुत सारी औरतें दिखीं जो अपने गरीब घरों के सामने बच्चों के साथ बैठीं थीं. मुझ अजनबी को देख कर औरतें और बच्चे दोनो मुझ से बात करने की कोशिश करते थे पर मैं उनकी बात कुछ समझ नहीं पाता था और बस मुस्करा कर रह जाता था. कोई कोई बच्चा मिला जिसे थोड़ी पोर्तगीस आती थी, उससे कुछ बात हुई. छोटे बच्चे मुझे देख कर डर से रोने लगते. बचपन से सिर्फ अपने जैसे अफ्रीकी चेहरे देख कर उन्हें मेरा चेहरा अवश्य भयावना लगता होगा!

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शाम को विद्यार्थियों के नृत्य और संगीत का कार्यक्रम था. सब लोगों ने कुछ न कुछ कर के दिखाया. ओदेत जो शिमोईयो से आई है और कुष्ठ रोग का उपचार पूरा कर चुकी है, उसकी आवाज़ बहुत मीठी है, जब गाती है तो मुग्ध कर देती है, जोश भी बहुत है उसमें, अपने प्रति भेदभाव से लड़ने का.

7 अप्रैल मोज़ाम्बीक में स्त्री दिवस के रुप में मनाया जाता है. इसलिए कोर्स में भाग ले रही सभी औरतों को एक कपूलाना (अफ्रीकी औरतों द्वारा पहने जाना वाला वस्त्र) दिया गया.

09.04.2006

सुबह यहाँ शहर की छोटी जेल देखने गया. शहर के बीचों बीच बहुत सुंदर जगह पर बनी है. सामने मिलेटरी की अकेडमी का भव्य भवन है. जेल के सामने से निकलिये तो भी वह दिखाई नहीं देती. नीची टूटी फूटी इमारत है. सलेटी रंग के पत्थर की दीवार पुराना खँडहर सी लगती है.

अंदर घुसे तो एक टीन की छत वाली खोली में हमें बिठा दिया गया. खोली में एक युवक बैठा टाईपराईटर पर कुछ टिपटिप करता लिख रहा था. उसके सामने मेज़ पर अपने हाथों में सिर छुपा करके एक और युवक बैठा था जिसके हाथ में कँपन हो रहा था. सोचा कि शायद वह युवक बेचारा अभी नया नया जेल में लाया गया है और उसी के कागज़ तैयार हो रहे हैं.

जेल का भवन बहुत नीचा सा एक मंजिला है. भीतर से लोगों के बात करने और चिल्लाने की आवाज़ें आ रहीं थी. बीच बीच में तेज गँध का झौंका भी आ जाता, हालाँकि जुकाम से मेरी नाक आजकल बंद है इसलिए गँध कम सूँघ पाता हूँ. तभी मेरे करीब खड़े एक सिपाही ने अपनी बंदूक की सफाई करना और उसमें गोलियाँ भरना शुरु कर दिया. पहले कभी कालाशनिकोव बंदूक इतने करीब से नहीं देखी थी, और उसमें भरती एक के बाद एक गोलियों की कतार को देख कर थोड़ी सी घबराहट हुई. सोचा कहीं गलती न चल जाये.

तभी जेल के भीतर से एक सिपाही बाहर निकला और कुछ क्षणों के लिए दरवाजे से जेल के कैदी दिखाई दिये. जाँघिया पहने नंगे काले बदन, जाल में फँसी मछलियों जैसे. उनके ऊपर पानी डाल कर उनकी सफाई की जा रही थी. फ़िर दरवाजा बंद हो गया. वापस खोली में, सिर नीचा करके बैठा काँपते हाथों वाला युवक अब टाँगें फैला कर मेज़ पर यूँ बैठा था जैसे यहाँ का अफसर हो. मन में सोचा कि शायद वह कोई नशा करता हो जिससे उसके हाथ यूँ काँप रहे थे.

कुछ देर बाद कैदियों का नहाना पूरा करके उन्हें वापस बंद कर दिया गया था और हमें जेल में भीतर ले गये. पाँच कमरे हैं इस जेल में जिसमें 90 कैदियों की जगह है. पहले कमरा नम्बर 1 में गये. घुसते ही जी मिचला गया, मन किया की भाग जाऊँ और भीतर न देखूँ. नीचे एक साथ आगे पीछे कतार में बैठे युवकों को देख कर लगा पुराने अफ्रीकी गुलामों को बेचने जाने वाले जहाज़ पर बनी फिल्म का दृष्य हो. भीतर की ओर चार छोटी खिड़कियाँ थी और एक कोने में एक पाखाना. पीछे की दीवार पर नीले प्लास्टिक के थैलों में कैदियों का सामान लटका था. और सामने जमीन पर उकड़ू बैठे 217 अधिकतर जवान लड़के, एक दूसरे के साथ सटे. दिन रात कैसे रहते हैं यह 217 लोग इस छोटे से कमरे में जिसमें ज़्यादा से ज़्यादा 10 या 12 पलँग लग सकते हैं! वे खाते सोते कैसे हैं? सुबह पाखाने में अगर उनमें से हर आदमी केवल 2 मिनट लगाये, तो भी सबकी बारी आने में सात या आठ घँटे चाहिये. अंदर पानी का नल भी नहीं है.

दूसरा कमरा बीमार कैदियों के लिए था, तीसरे कमरे में पुराने और बिगड़े हुए खतरनाक कैदी थे.कमरा नम्बर चार अँधेरा कमरा था जहाँ सजा देने के लिए कैदियों को अँधेरे में रखा जाता है. वहाँ से किसी की आवाज़ आ रही थी. कमरा नम्बर पाँच जो सबसे बड़ा था, उसमें 271 कैदी थे.

यह नर्कतुल्य जेल उन कैदियों के लिए है जिनका मुकदमा नहीं पूरा हुआ और जिनकी सज़ा नहीं निर्धारित हुई. साल या छहः माह तक की छोटी सजा पाने वाले कैदी भी यहीं रहते हैं. जेल में फोटो नहीं खींच सकते, यह कहा गया मुझसे जब मैंने कमरे में बकरियों की तरह ठूँसे लड़कों की तस्वीर लेनी चाही.

बाद में जेल के बारे में मेरीलेना से बात कर रहा था जो इस जेल में कैदियों की सहायता का काम करती है. बोली की जेलर समझदार आदमी है. बहुत कुछ बदलना उसके हाथ में नहीं है पर जितना हो सकता है वह मदद करने की कोशिश करता है.

बाद में शहर के 15 किलोमीटर दूर बड़ी जेल में भी गये. वहाँ जगह भी अधिक है और कमरे अधिक साफ़ और सुंदर हैं और कैदी अधिक आराम से रहते हैं. हर कमरे में चार या पाँच. सोचा कि यहाँ बड़ा अपराध करके लम्बी सजा पाना ही अच्छा है बजाय कि छोटा अपराध करके शहर की छोटी जेल में जाना! बड़ी जेल में जेलर ने अनुमति दी कि दामा का खेल खेलते कैदियों की दो तस्वीरें खींच लूँ.

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11.04.2006

कल इल्या से वापस आये. इल्या याने द्वीप. मोजाम्बीक के पूर्वी तट सेकुछ दूर छोटा सा द्वीप है जहाँ पोर्तगीस लोगों का पहला शहर बना था और जहाँ उन्होंने इस देश की पहली राजधानी बनाई थी. अफ्रीकी गुलामों के व्यापार में इल्या ने प्रमुख भाग निभाया था.

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"इल्या दो मोजाम्बीक" का द्वीप धरती से एक लम्बे पुल से जुड़ा है. सागर, नाव, मछुआरे, समुद्रतट पर घूमते पर्यटक देख कर छुट्टियों और मजे करने का विचार मन में आता है हालाँकि हम लोग यहाँ काम से आये हैं.

द्वीप पुराने रंग बिरंगे घरों से भरा है जिनमे से बहुत सारे आज खँडहर जैसे होरहे हैं, जिनकी भव्य दीवारों के बीच घासफूस उगी है या फिर पेड़ उग आये हैं. मछुआरों के घर फूस की झोपड़ियाँ हैं.

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द्वीप के उत्तरी कोने पर पोर्तगीस का पुराना किला है जहाँ गवर्नर रहते थे, उनकी फौज रहती थी और जहाँ यूरोप और अमरीका की तरफ जाने वाले गुलाम बंद किये जाते थे.

अस्पताल में काम समाप्त करके, रात को एक छोटे से होटल "कासा बरान्का" में ठहरे. सुबह यहाँ के हिंदू मंदिर भी गया जहाँ के पंडित जी भारत से आये हैं. उन्होंने बताया कि 1960 से पहले इल्या में करीब 500 भारतीय रहते थे पर स्वतंत्रता की लड़ाई के बाद पोर्तगीस के साथ वे भी यहाँ से चले गये. आज इल्या में कुछ भारतीय मूल के हिंदू लोगों के व्यापार हैं और उन्होंने ही पंडित जो को भारत से बुलवाया है पर वह स्वयं वहाँ नहीं रहते, नमपूला में रहते हैं.

इल्या के सम्बंध भारत से गोवा की वजह से भी थे. इल्या के एक पोर्तगीस गवर्नर गोवा से आये थे, उनके घर का बहुत सा सामान भी गोवा का ही है.

द्वीप में घूमते घूमते नमपूला में रहने वाले कुछ भारतीय मूल के लोगों से मिलने का मौका भी मिला. उनमे से सबसे बड़े थे श्री पंकज भट्ट. मैंने उन्हे वादा किया है कि नमपूला वापस आ कर उनसे मिलने अवश्य जाऊँगा.

इल्या में बिताये दो दिनों से सारी थकान दूर हो गयी. आज से फिसियोथेरेपिस्ट के लिए कोर्स शुरु हो रहा है जिसमे मुझे पढ़ाना है.

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12.04.2006

कल तो थोड़ा ही पढ़ाना था मुझे अधिक कठिनाई नहीं हुई, पर आज सुबह के पहले चार घँटे मुझे ही पढ़ाना था. बीच में कई बार ठीक से समझाने के लिए पोर्तगीस भाषा में उपयुक्त शब्द ढ़ूँढ़ने में मुझे दिक्कत हुई. जब तक भोजन का समय आया, थकान के मारे मेरा बुरा हाल था. जी कर रहा था कि बस अब किसी से पोर्तगीस में न बोलना पड़े, चुपचाप कहीं भी बैठ कर कुछ आराम करुँ. पर जब हमारे साथ यहाँ के अस्पताल के बड़े अफसर खाना खाये आये तो उन्हें न कैसे करता. खैर खाना खाने के दौरान मैंने कोशिश की कम से कम बात करुँ.

अभी दोपहर में दो घँटे और पढ़ाना है. फ़िर आज रात को यहाँ के एक प्रसिद्ध एन्थ्रोपोलोजिस्ट के साथ खाने का निमंत्रण है. एन्थ्रोपोलोजी यानी मानव वर्ग के व्यवहार और रहने सहने के तरीकों को समझने का विज्ञान मुझे बहुत अच्छा लगता है. सुना ही कि श्री चेस्कातो, जिनके साथ आज रात को खाना है, ने यहाँ की विभिन्न जनजातियों के रीति रिवाजों पर महत्वपूर्ण शौध कार्य किया है, इसलिए उनसे मिलने को मैं बहुत उत्सुक हूँ. लेकिन साथ साथ मन में यह इच्छा भी है कि सारा दिन पोर्तगीस बोलने के बाद कुछ आराम करने का मौका मिले. खैर चेस्कातो जी से मिलने का मौका तो मैं नहीं छोड़ सकता, चाहे उसके लिए फ़िर से पोर्तगीस में ही बात करनी पड़े.

कल सुबह यहाँ से 40 किलोमीटर दूर एक गाँव में जाना है जहाँ हमारे फिजियोथैरेपी के कोर्स के छात्र मरीज़ों पर प्रेक्टिकल काम करके दिखायेंगे. साथ साथ एक गाँव को करीब से देखने का मौका भी मिलेगा. मुझे किसी नई जगह पहुँच कर शहरों में स्मारक या पर्यटक स्थल देखने के बजाय आम लोगों का गाँव का जीवन देखना और समझना अधिक अच्छा लगता है, हालाँकि यहाँ की स्थानीय भाषाएँ न आने की वजह से, यहाँ के गाँव के लोगों से सीधे बात नहीं कर पाऊँगा.

13.04.2006

आज सुबह मैं और आन्ना अपने कोर्स के छात्रों के साथ नामाइता नाम के गाँव में गये. जो भी अब तक पढ़ाया है उसे रोगियों पर कैसे इस्तमाल कर सकते हैं इसकी प्रेक्टिकल शिक्षा का दिन था. सुबह सुबह निकले और नमपूला से दक्षिण दिशा में गये.

शहर में गाड़ी बहुत धीरे चलाती है आन्ना. मोड़ मुड़ना हो और दूसरी तरफ से कोई साइकल भी आ रही हो तो वह उसके निकलने के बाद ही मुड़ती है. कभी कभी इतना धीरे चलाती है कि कुछ खीज सी होती है. पर शहर से बाहर निकलते ही आज जब उसने गाड़ी इतनी तेज चलायी तो मैं दंग रह गया. डर लग रहा था कि कहीं कोई गाँव वाला या बच्चा सामने न आ जाये, पर वह यूँ चला रही थी जैसे यूरोप का कोई हाईवे हो.

नामपूला के आसपास बहुत सी पहाड़ियाँ हैं पर अजीब सी हैं. सपाट धरती पर अचानक बीच में सिर उठाये धरती को चीर कर निकल आती हैं और वैसे ही अचानक ही खत्म हो जातीं हैं, आगे पीछे कोई चढ़ाव या उतार नहीं होता. लगता है जैसे कोई आकाश में पहाड़ ले कर हनुमान जी की तरह जा रहा था और रास्ते में उसके हाथ से कुछ पहाड़ियाँ यहाँ वहाँ छूट कर गिर गयीं हों.

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परसों एलिया चेस्कातो जो बूढ़े पादरी हैं और एंथ्रोपालोजिस्ट भी, ने बताया था कि इन पहाड़ियों में गुफाओं में आदि मानव रहता था. उस जीवन के निशान गुफाओं के भीतर बने भीत्तिचित्रों में आज भी बने हुए हैं. उन्होंने कहा कि शनिवार को वह एक नई गुफा को देखने जा रहे हैं जिसकी खबर उन्हें कुछ गाँव वालों से मिली है और मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके साथ जाना पसंद करुँगा. दिल तो बहुत किया, क्योंकि मुझे इस तरह के विषयों में बहुत दिलचस्पी है पर मना करना पड़ा क्योंकि शनिवार को सुबह एक अन्य गाँव में कुष्ठ रोग के रोगियों को देखने जाने का प्रोग्राम पहले से ही बना है और शनिवार की शाम को मुझे वापस मापूतो जाना है, जहाँ से रविचार को इटली वापस जाने के लिए चलना है.

नामाइता गाँव में मैं 12 साल पहले भी एक बार जा चुका था. जब पिछली बार गया था तब मोजाम्बीक 20 साल के गुहयुद्ध से निकला ही था और नामाइता गाँव के स्वास्थ्य केंद्र में लड़ाई का केंद्र था. तब अस्पताल के भवन पर गोलाबारी के निशान थे और आसपास की धरती पर चलने से बम फटने का खतरा था. अस्पताल के एक भाग में उस समय भी मिलेट्री के आदमी रह रहे थे. तब सड़क स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं आती थी, बहुत सा रास्ता कच्ची पगडँडी जैसा था.

इस बार वैसा कुछ भी नहीं था. अस्पताल रोगियों से भरा था. एक बड़े पेड़ के नीचे नवजात बच्चों के चेकअप का कैंप लगा था जहाँ छोटे बच्चों को ले कर महिलाओं का झुँड अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहा था. सारा दिन भागाभागी में ही निकल गया. जब वापस आने का समय आया तो हम लोगों के साथ हमारी गाड़ी में एक बीमार बच्चा भी था. छोटा सा, कुछ महीनों का वास्को साँस नहीं ले पा रहा था और उसका शरीर बुखार से तप रहा था. माँ ने छाती से लगा रखा था. चाहे यहाँ की स्थानीय माकूआ भाषा न भी आती हो माँ की पीड़ा और आँखों में भरे डर को समझने केलिए शब्दों की जरुरत नहीं थी. जब वापस नमपूला पहुँचे तो सीधा यहाँ के बड़े अस्पताल में गये जहाँ आन्ना तुरंत उसे भीड़ से निकाल कर अपनी जान पहचान के बच्चों के डाक्टर के पास ले गयी. क्या जाने उस बच्चे की किस्मत में जीना लिखा है या नहीं!

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14.04.2006

कल कोर्स समाप्त हुआ तो लगता है कि मानो कँधों से बड़ा बोझ उतर गया हो. सारा दिन पोर्तगीस बोलना उतना कठिन नहीं था, जब कोई शब्द नहीं आता तो मैं इतालवी या फ्राँसिसी भाषा के शब्द से कोशिश करता और छात्र समझ जाते. यह सभी भाषाएँ लेटिन मूल की हैं और कुछ कुछ मिलती जुलती हैं. दिक्कत तब आती जब छात्र मुझसे कुछ सवाल पूछते, कई बार मुझे ठीक से समझ नहीं आता और उन्हें धीरे धीरे दोहराने के लिए कहना पड़ता.

कल सारा दिन बारिश आती रही, रात को भी बंद नहीं हुई. कई बार तो इतनी तेज़ जैसे कोई ऊपर से बाल्टियाँ उड़ेल रहा हो. आज सुबह भी हल्की बारिश आ रही है. मन में यहाँ कुछ साल पहले आई बाढ़ की बात आ गयी और कुछ चिंता हो रही है कि कहीं कल वापस मापूतो जाने में कोई रुकावट न आ जाये.

शाम को वापस कमरे में आया तो पाया बत्ती नहीं है. सोचा कि बल्ब फ्यूस हो गया होगा. निकोला, हमारे यहाँ के दफ्तर में काम करने वाला जो इटली से आया है और इस घर में रहता है, वह वापस आया तो उसे बताया कि बल्ब बदलना पड़ेगा. तब मालूम चला कि दिक्कत केवल मेरे कमरे में नहीं आधे घर में है. घर का एक भाग बिना बत्ती के है जबकि दूसरे भाग में बत्ती है. आज बिजली वाला बुला कर दिखाना पड़ेगा. पर बिजली न होने से बड़ी दिक्कत है पँखे का न होना. इतनी उमस हो रही है कि बिना पँखे के रहा नहीं जाता और खिड़की नहीं खोल सकते क्योंकि मच्छर बहुत हैं, और मलेरिया का डर है. रात भर बीच बीच में गरमी से आँख खुल जाती.

आज सुबह हमें यहाँ से 50 किलोमीटर दूर रपाले डिस्ट्रिक्ट में जाना है, यह डर भी है कि बारिश की वजह से कोई कठिनाई न हो जाये.

बारिश की एक और दिक्कत है, इसकी वजह से मैं अभी तक नमपूला में रहने वाले पंकज भट्ट जी जो इल्या में मिले थे, से मिलने भी नहीं जा पाया. गाड़ी में से गुजरते समय उनकी दुकान को देखा है. हमारे दफ्तर के घर से करीब 15 मिनट का पैदल रास्ता है. एक दो बार जब शाम को कुछ समय था और उनसे मिलने जा सकता था तो उस समय बारिश आ रही थी और बाहर निकलने का मन नहीं किया. आन्ना ने बताया कि उसके अस्पताल में कान नाक के एक भारतीय डाक्टर भी हैं, डा. माथुर, पर उनसे मिलने को भी कोई मौका नहीं मिला.

16.04.2006

कल रात को मापूतो वापस आ गया और आज शाम को पहले जोहानसबर्ग और फ़िर फ्रेंकफर्ट की उड़ान है. कल आन्ना और निकोला को विदा कहते हुए अपनों से बिछड़ने का दुख हुआ. दो सप्ताह हमने साथ गुजारे, एक तरफ निकोला के साथ एक घर में रहता था, दूसरी तरफ दिन भर काम का अधिकतर समय आन्ना के साथ गुज़रता था. यहाँ आने से पहले आन्ना को थोड़ा सा जानता था पर निकोला से बिल्कुल जान पहचान नहीं थी, बस एक बार देखा ज़रुर था.

चाह न चाह कर भी, दिन भर साथ रहते रहते, लोगों के व्यक्तिगत जीवन और विचारों के बारे में समझ आ ही जाती है विषेशकर अप्रवासी काम करनेवालों के बारे में, जो घर और मित्रों से दूर अकेलेपन में रह रहे हों और जिन्हें बात करने की बहुत जरुरत हो. आन्ना को मोज़ाम्बीक में तीन साल हो गये. सुबह सुबह उसका काम का जीवन शुरु होता है, देर रात तक ही खत्म होता है. सारा दिन मरीज़ देखो, डिस्ट्रिक्ट और गावों के स्वास्थ्य केंद्रों में काम करने वाली नर्सों तथा अन्य लोगों का काम देखो, मेडीकल कालेज में पढ़ाओ. लगा कि वह अपने जीवन के सूनेपन से भाग रही है, उसे काम से इतना भर कर कि कुछ सोचने का मौका न मिले. ऊपर से वह बात करने में कभी कभी बहुत कठोर लगती है पर किसी को दुख में देख कर तुरंत विचलित हो जाती है और उसकी यह कठोरता स्वयं को चोट लगने से बचाने का कवच सा लगती है.

कल दोपहर को नमपूला शहर का एक युवा नाटक ग्रुप जो स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ काम करता है और गाँवों में स्वास्थ्य संबंधी संदेश नाटक के द्वारा ले जाता है, मुझे एक नाटक दिखाने आया. 9 युवा लोग है इस नाटक समूह में. नाटक एक कुष्ठ रोगी के बारे में था जिसकी पत्नी उसे छोड़ कर चली जाती है जब उसे मालूम चलता है कि उसके पति को कुष्ठ रोग है. तब उसका पति अस्पताल से अपना इलाज कराता है, ठीक हो जाता है और अपनी पुरानी प्रेमिका से विवाह कर लेता है. जब उसकी पहली पत्नी क्षमा मांग कर घर वापस आना चाहती है, वह उसे धक्के मार कर बाहर निकाल देता है. यह सारी बात मुझे उनके सामाजिक वातावरण से प्रभावित लगी जहाँ पुरुष अक्सर पत्नी को छोड़ कर दूसरी शादी कर लेते हैं या प्रेमिकाएँ रखते हैं जबकि स्त्री इस तरह का व्यवहार करे, यानि, पति को छोड़ कर कोई दूसरा मर्द कर ले, उसको समाज अच्छा नहीं मानता.

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पर क्या नाटक कार होकर हमें समाज में हो रही गलत बातों को मान लेना चाहिये, उसको बदलने के लिए कोशिश नहीं करनी चाहिए, इस बात पर मेरी उनसे नाटक के बाद बहुत बहस हुई. वे कहते थे कि अगर वे नाटक में समाज की रीतियों के विपरीत जायें तो बहुत से लोग उनका नाटक देखने नहीं आयेंगे और यह कि उनका काम समाजिक समास्याओं के बारे में नहीं, स्वास्थ्य संबधी विषयों पर संदेश देना है. फ़िर भी मेरे विचार में इस बहस से कम से कम उस समूह की युवतियों को कुछ नया सोचने का मिला होगा और शायद वे इन नाटकों की कहानियाँ बदल पायेंगी!

17.04.2006

इस समय घर वापस जाने की यात्रा में फ्रेंकफर्ट पहुँचा हूँ. कल सुबह मापूतो में कुछ नहीं देखा. मासिमो के साथ ही ठहरा था, उसने कहा कि मुझे शहर घुमाने ले जायेगा पर मुझे अच्छा नहीं लगा कि ईस्टर के दिन वह परिवार छोड़ कर मेरे साथ समय बिताये. ईस्टर परिवार में रहने का त्योहार है और मासिमो के तीन छोटे बच्चे हैं, इसलिए मुझे लगा कि कम से कम छुट्टी के दिन उसे मेरे साथ न रहना पड़े.

अकेले घर से निकलने के लिए मासिमो ने मुझे चेतावनी दी थी कि पैसे या पासपोर्ट को ले कर अकेला बाहर न निकलूँ क्योंकि बाहर चोरी का बहुत खतरा है. यही सोच कर सुबह थोड़ी देर के लिए सैर को निकला और समुद्र तट तक गया पर साथ में न कैमरा लिया न पैसे. घूमते समय चारों और देख रहा था कि कोई संदेहनीय लोग तो नहीं हैं.

मोज़ाम्बीक की इस यात्रा की बहुत सारी यादें साथ हैं पर उन सब में जो याद सबसे अधिक जीवित है वह है नमपूला की शहर की जेल में छोटे से कमरे में जानवरों की तरह बंद वे 217 युवक. ज़मीन पर उकड़ू बैठे, सिपाहियों के सामने निरीह लगने वाले अधनंगे जवान चेहरे, एक दूसरे के साथ इतने सटे हुए जैसे डिब्बे में बंद मछलियाँ, जिनको देख कर मणी रत्नम की "युवा" के लल्लन का विचार मन में आता था. एक बार जो भी कुछ महीने या साल उस नर्क में गुजार कर बाहर आता होगा वह हमेशा के लिए बदल जाता होगा. "अपराधी" सोच कर मन में खूँखार सी छवि बन जाती है मन में, पर उन चेहरों में खूँखारता नहीं थी, निर्बोधता सी थी.

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