अनलिखे पत्र (कहानी) सुनील दीपक जुलाई 2005

जिज्जी, आज तुम्हारा जन्मदिन है. तुम इसे मनाओ या नहीं, मैं तो उसे मना ही रहा हूँ.

लिज़ा, मेरी मकान मालकिन आई हुई हैं. वे टेलीविजन के सामने बैठ कर स्वेटर बुन रहीं हैं और मैं रसोई में करेले बना रहा हूँ. सुबह सुबह इन्हें छील कर और नमक लगा कर रख दिया था. अब उनमें थोड़ा सा मसाला भर कर भून रहा हूँ. तुम्हें याद है जिज्जी जब हम दोनों मिल कर रसोई में बैठ कर परांठे बनाते थे और माँ उन्हें पकाती थी ? मेरे परांठे कैसे टेढे मेढे बनते थे, पर कभी कभी माँ मुस्करा कर उन्हें यूँ ही टेढे मेढे ही पका देती थी? अब मेरे परांठे बिल्कुल भी टेढे मेढे नहीं होते, जिस आकार में उन्हें बनाना चाहूँ वैसे ही बनते हैं. लिज़ा को भी मैंने रोटी और परांठे बनाना सिखा दिया है. पिछले दिनों में इतनी बर्फ गिरी थी कि बाहर निकलना मुश्किल हो गया था. तीन दिन तक लगातार बर्फ गिरी. ऐसे में गाँव तक जा कर दुकान से ब्रेड लाना असंभव हो गया था, तो उन्होंने भी घर पर ही रोटी बनायी.

तुम सोचोगी कि यहाँ के रहने वालों में रोटी बनाने या खाने की तो आदत न हो पर यह बात नहीं है. यहाँ पर भी एक रोटी जैसी चीज़ होती है, जिसे ये लोग कहते हैं प्यादीना. फर्क बस इतना है कि प्यादीना में और भी चीज़े पड़ती हैं और आटा कम से कम एक दिन पहले गूँध कर रखना पड़ता है. लिज़ा कहती है कि हिन्दुस्तानी रोटी अधिक अच्छी है क्यों कि जब दिल चाहे तभी बना लो ताज़ा ताज़ा, और हजम करने में भी ज्यादा आसान. देखा तुमने खाना बनाने के बारे में कितना जान गया हूँ? मेरे मित्र कहते हैं कि मेरा बनाया हुआ खाना यहाँ के भारतीय रेस्टोरेंट से भी बढिया होता हैं. मालूम है मुझे कि मेरे बनाये खाने के उन्हें कोई पैसे नहीं देने पड़ते जबकि रेस्टोरेंट में अच्छा खासा बिल चुकाना पड़ता है तो मेरी तारीफ तो करेंगे ही, पर कुछ तो सच होगा ही उनकी बात में.

जिज्जी कितनी अज़ीब बात है कि तुम मुझसे सिर्फ एक साल बड़ी हो पर तुम्हें तुम्हारे नाम से बुलाने की मैं सोच भी नहीं सकता, जबकि लिज़ा तो करीब 74 साल की है पर उसे उसके नाम से पुकारने में कुछ अज़ीब नहीं लगता. यही चलन है यहाँ का. सब को उनके नाम से ही बुलाओ, न कोई मामा न चाचा, न भैया, न मौसी न आँटी. आज तुम 31 साल की हो गयी हो जिज्जी. जब छोटा था तो सोचता था कि 31 साल के लोग तो बहुत बड़े होते हैं, शायद बूढे हो जाते है. पर आज लगता है कि 31 साल में तो जीवन शुरु ही होता है. आजकल तो यहाँ 35 या 38 से पहले लड़कियाँ शादी ही नहीं करतीं और अगर बच्चे पैदा करने की भी सोचती भीं हैं तो बस एक, वह भी अगर आ जाये तो सही, नहीं तो न सही.

गरमियाँ आती हैं तो लिज़ा भी दो पीस की बिकिनी पहन कर पीछे खेतों में चद्दर बिछा कर धूप में लेट जाती है. शुरु शुरु में बड़ा अजीब लगता था और ऐसे कपड़ों में उसकी तरफ देखने में बहुत शर्म आती थी. छुप छुप कर देखता था उसकी तरफ. फ़िर धीरे धीरे आदत हो गयी. जब वह बिना किसी परेशानी के मेरे सामने घूमती थी, बातें करने लग जाती थी, तो देखे बिना कैसे रहता ? वह कहती, इतनी गरमी में तुम इतने कपड़ों में कैसे दबे दबे रहते हो, क्या तुम्हारे देश में पुरुषों को भी काले चद्दर पहनने वाली औरतों की तरह शरीर को दिखाने में परेशानी होती है? लिज़ा से हिन्दु मुसलमान की बात करना बेकार है, कहती है कि उसे समझ नहीं आता. पर धीरे धीरे मेरी शर्म भी मिट गयी. अब मैं भी, जब गरमी आती है तो उसी की तरह छोटी सी नैकर या जाँघिया पहन कर ही घर में घूमता हूँ. वैसे भी कौन है मुझे देखने वाला यहाँ, लिज़ा के सिवाय ?

प्याज़, टमाटर काटने हैं अभी और चिकन भी तैयार करना है. खाना पकाने का काम भी कर रहा हूँ और मन ही मन तुमसे बातें भी. तुम्हें मेरी चिट्ठी और कार्ड तो मिल ही गया होगा. तुम्हें चिट्ठी लिखने बैठता हूँ तो समझ में नहीं आता कि क्या लिखूँ. जिज्जी जब हम दोनो छोटे थे तो कितनी बातें करते थे, फ़िर क्या हो गया हमें, कैसे और कब खड़ी हो गयी यह दीवारें हम दोनों के बीच ? मन ही मन तुमसे बातें करता हूँ सारा दिन अपने अकेलेपन में, पर कुछ नहीं कह पाता हूँ तुम्हें. ऐसा क्यों जिज्जी ?

रसोई में लिज़ा का कुत्ता एमिलियो भी है. उसने कटते हुए चिकन को सूँघ लिया है बस जाने का नाम नहीं लेता. सामने बैठ कर मुझे ऐसी नज़रों से देखता है मानों कई सालों से भूखा हो. लिज़ा कहती है कि मैंने उसे अपनी प्लेट से कुछ न कुछ दे कर बिगाड़ दिया है. वह बिगड़ा है या नहीं, यह तो नहीं मालूम पर आज मुझे उस पर बहुत दया आ रही है. बेचारे के सिर पर तीन टाँके लगे हैं. यहाँ गाँव के किसी लड़के ने ही शैतानी की है. बेचारा एमिलियो इतना सीधा कुत्ता है, भौंकना तो आता ही नहीं उसे. कभी कभी खेत में कोई खरगोश दिख जाये तो थोड़ी सी चीं चीं कर लेता है, जैसे कि कुत्ता नहीं हो चिड़िया हो. लिज़ा कहती है कि पहले उसके पास एक बिल्ला भी था. जब एमिलियो आया तो कुछ दिन का ही था और उस बिल्ले के साये में ही बड़ा हुआ. कहती है कि शायद इसी बात से उसके दिमाग में कुछ हो गया होगा. शायद वह अपने को भी बिल्ला समझता है, कुत्ता नहीं. लेकिन मेरे विचार में बात सिर्फ इतनी है कि एमिलियो प्रेमपूर्ण कुत्ता है, उसे सिर्फ सब को प्रेम से चाटना ही आता है. लिज़ा कहती है कि अगर ऐसा कोई चोर आये जिसे चाटने से डर लगता हो या कुत्तों से एलर्जी हो तभी एमिलियो कुछ काम आयेगा वरना तो यह चोरों का भी चाट चाट कर स्वागत करेगा.

ऐसा भोला भाला एमिलियो भला गाँव के गुण्डों के सामने क्या करता ? उन लड़कों को लिज़ा से विषेश चिढ है, कभी रात को आ कर पत्थर फैंक कर उसकी खिड़की के शीशे तोड़ जाते हैं, कभी बाहर दीवार पर उल जलूल कुछ भी लिख देते हैं. पहले तो समझ ही नहीं पाया था कि क्या बात है. हम काली चमड़ी वाले, गरीब देशों से आये लोगों को तो ऐसे लड़के तंग करते ही हैं, पर एक बेचारी बुढिया से कैसी लड़ाई? फिर एक दिन मैनें लिज़ा की बाईं बाजू पर लिखा हुआ एक नेम्बर देख कर उसके बारे में पूछा तो बात समझ में आयी. लिज़ा "एबरेया" है, यानि कि, ज्यू या यहूदी. 1941 में गयारह साल की थी जब उसे पकड़ कर पोलैंड में एक ऐसी जगह ले गये थे जहाँ उसके माँ, पिता, बड़ा भाई और छोटी बहन सब मर गये. उस जेल का नम्बर लिज़ा की बाजू पर खुदा हुआ है.

इसी लिये सोच लिया है कि यहीं रहूँगा, लिज़ा के पास, जब तक वह चाहेगी. जब यहाँ आया था तो कहीं घर नहीं मिल रहा था और नियती लिज़ा के पास ले आयी. अब चाँहू तो शहर मे जहाँ काम करता हूँ वहीं करीब मे ही घर ले सकता हूँ पर मैंने यहीं रहने का निर्णय किया है.

बहुत जिन्दादिल और हिम्मत वाली है लिज़ा. जिज्जी कभी कभी सोचता हूँ कि एक बार तुम यहाँ आ जाओ और लिज़ा को जान जाओ तो शायद तुममे भी कुछ ज़िन्दादिली और हिम्मत आ जाये. जैसे लिज़ा अपने बीते हुए समय के बारे में बातें कर सकती है, हम लोग क्यों नहीं कर पाये कभी ? वह कभी कभी जोर जोर से रोती है, चिल्लाती है, पागलों की तरह हसँती है. थोड़ी सी वाइन पी कर, कभी कभी मुझसे पुरानी बातें करने लग जाती है, तो मैं भी उसके साथ रो पड़ता हूँ. ऐसे सवाल पूछती है, जिनका कोई जवाब नहीं हो सकता. मैं क्यों नही मरी, सब मर गये मैं क्यों बच गयी, पूछती है. क्या उत्तर हो सकता है ऐसे प्रश्न का? यह हमसे बढ कर कौन जानेगा जिज्जी? क्यों बच गये हम जिज्जी, क्यों नहीं मरे अम्मा के साथ हम?

"तुम्हारा पत्र मिला और यह जान कर खुशी हुई कि सब ठीक ठाक है."

Short story sunil deepakबस दो पंक्तियाँ लिख कर ही मेरे हाथ रुक जाते हैं. कितनी बातें हैं तुमसे करने के लिये, पर ये चारों ओर खड़ी दीवारें जो इन वर्षों मे हम दोनो के बीच उठ खड़ी हो गयीं हैं, इन्हें कैसे पार करुँ ? तुम्हें झूठ लिखने की आदत सी हो गयी है. सच लिखा नहीं जाता. इसीलिये लिख देता हूँ कि सब कुछ ठीक ठाक है.

जिज्जी, तुमने लिखा है "प्रिय मुन्ना, इश्वर से तुम्हारे सुख की इच्छा है". पर क्या तुम नहीं जानती मुझे किस बात से सुख मिलेगा? अवश्य जानती हो पर जान कर भी अनजान बनती हो. तुम इस तरह अपने जीवन को नष्ट कर रही हो, जिसे तुमने नाम दिया है "हमारा नैतिक और सामाजिक संतान का धर्म". ये कैसी नैतिकी है जो अनैतिकता, अधर्म पर खड़ी है ? कौन सा समाज माँगता है यह धर्म? किस मुँह से माँगता है कोई यह तुमसे या मुझसे? जिज्जी मुझे लगता है कि कोई अन्य नहीं माँगता यह तुमसे, तुमने स्वयं ही यह मोल लगाया है अपने किसी अनकिये पाप का पश्चाताप करने के लिये. यही दीवार है, जिज्जी हमारे बीच. झूठ की दीवार, चीजों को उनके नाम से नहीं, कुछ और बुलाने वाले झूठ की दीवार. तो बताओ कैसे बात करेंगे हम जब हम बातों को उनके सही नामों से भी नहीं पुकार सकते?

झूठ कहती हो तुम जिज्जी. तुम मेरा सुख नहीं चाहती, तुम चाहती हो कि बिना कोई बहस किये मैं तुम्हारी व्याखि्त नैतिकता तथा समाजिक संतान के धर्म के सामने नतमस्तक हो जाऊँ. मैं ऐसा नहीं कर सकता और जिज्जी, न ही ऐसा करने से मुझे कोई सुख मिलेगा. इसलिये अगर तुम सचमुच मेरे सुख की इच्छा करती हो तो मुझसे ये आशायें छोड़ दो.

लिज़ा कहती है कि यह जीवन है जिसे मैंने कैद में अपने दाँतों से पकड़ कर रखा था, परिवार की बलि दी है मैंने इसके लिए, तो रोऊँगी, चिल्लाऊँगी, पर इस जीवन को अपने ढंग से जिऊँगी, सिर्फ अपने लिये नहीं, उन सबके भी लिये जिन्हें क्रेमाटोरियम में गैस से मार डाला था जल्लादों ने. ये जीवन केवल मेरा नहीं, वो सब भी मेरी साँसों में ज़िन्दा हैं. तो जिज्जी, अम्मा का जीवन, क्या वह तुम्हारे अंदर नहीं माँगता अपने जीने का अधिकार?

जिज्जी तुम कहोगी, मैंने अपने पत्र में कहीं ऐसा कुछ भी नहीं लिखा. यह यह भी सच है कि तुम ये बातें बिना कहे, अपनी हर बात में कहती हो. जब तुम गंदी, फ़टी हुई साड़ी पहन कर सुबह घंटी ले कर आँखें मूँद कर पूजा करने बैठ जाती हो यही नहीं कह रही होती क्या? क्या बात करुँ तुमसे, जब तुम हँस कर कहती हो "तुम पहले खा लो मैं फिर खाऊँगी." किसने कहा तुमसे की अपना जीवन नकार कर यह विधवा का मुखौटा पहन लो, उसकी याद में जो तुमसे तीस साल बड़ा था, और जो तुम्हें खरीद कर ले गया था अपने उधार के बदले ?

क्या बात करुँ तुमसे, जिज्जी जब तुम मुझसे मेरे पुत्र धर्म की बात करती हो? हाँ तुम इस बारे में सीधा साफ कुछ नहीं लिखती. पर जो बिना लिखे शब्द, जो अनकही बात, तुम्हारे पत्र की पंक्तियों के बीच मे से मेरी ओर बार बार झाँकती है, उससे क्या तुम इन्कार करोगी ?

तुम्हें याद है जिज्जी कैसे बचपन मे हम दोनो बिना कहे ही एक दूसरे की बात को समझ जाते थे? मैं और तुम, एक हो कर अम्मा की रक्षा में? तुम्हें बचपन की वे सब बातें याद हैं या भूल गयी हो? बचपन में तो तुम्हारी बातें बिना कहे ही समझ जाता था पर आज तुम्हारी कोई कही बात भी नहीं समझता, शायद इसीलिये कि तुम से सीधी तरह कोई बात नहीं कर पाता, बस सवाल ही पूछ पाता हूँ तुमसे, वो भी अपने अकेलेपन में.

लिज़ा रसोई में आयी है पानी पीने के लिये. मैं चुप चाप आँखें पौंछ लेता हूँ. "ये प्याज़ काटना कितना झंझट है", कह कर मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ पर मुस्कान कोनों पर से टूटने सी लगती है. लिज़ा कुछ और नहीं पूछती मुझसे. उसे समझ है, इतनी, जानती है वह कि आज तुम्हारा जन्मदिन है, तभी तो यह भोज तैयार कर रहा हूँ. लिज़ा जानती है आत्मा के घावों के बारे में, जो कभी नहीं भरते. इसलिये उससे कुछ नहीं कहना पड़ता, कुछ सफाई देने की ज़रुरत नहीं है.

Short story sunil deepakहै न अजीब बात, तुम्हारे जन्मदिन पर हम यहाँ चिकन बिरयानी खायेंगे और तुम शायद आज भी हर रोज़ की तरह से वही रोटी दाल, रसोई में छुप छुप कर ऐसे खा रही होगी जैसे कोई चोरी कर रही हो. कैसे समझाऊँ तुम्हें जिज्जी, अगर तुम न होतीं तो मैं उसके इलाज़ या खाने के लिये एक पैसा भी न भेजता?

"यहाँ हम सब लोग भगवान की कृपा से ठीक हैं". सब लोग कौन जिज्जी? और यह भगवान कहाँ से आ गये मेरे और तुम्हारे बीच मे? जब आना चाहिये था, उस समय कहाँ चले गये थे यह तुम्हारे भगवान ? क्यों आ गये हैं अब, हम पर हँसने के लिये? क्यों ठीक हैं सब लोग, जिज्जी? सब कुछ बिगड़ जाने के बाद, नष्ट हो जाने के बाद, क्यों सब कुछ ठीक है? झूठ है यह सब. कुछ ठीक नही है और न कभी ठीक होगा, अगर तुम अपना जीवन इस तरह मिटा दोगी.

तुम्हें अम्मा याद हैं जिज्जी? तुम्हें याद है, जब अम्मा पतीले की मलाई चाटने को केवल मुझे ही देती थी और तुम मुझे ताकती रहती थी? तुम्हें याद है, जब हम दोनो गोबर ढ़ूंढ़ने जाते थे? गर्म गर्म, नरम नरम, गोबर का हाथों को छूना तुम्हे याद है? दीवार से लगे उपलों की गंध याद है तुम्हें जिज्जी? अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, याद है तुम्हें इमली की गीटियों से खेलना? तो फिर अम्मा भी जरुर याद होगीं तुम्हें जिज्जी. बोलो कैसे सब लोग ठीक हैं? अम्मा को भूल कर भला कैसे हम सब लोग ठीक रह सकते हैं?

"भगवान की कृपा से.." लिखते हुये तुम्हारी कलम तो काँपी होगी जिज्जी? तुम्हें अम्मा का खाँसना तो याद होगा? साड़ी का पल्लू मुँह मे दबा कर दबे दबे रात रात भर खाँसना? "हरामजादी, छिनाल, कुत्ती की बच्ची, न काम की न काज की, रात को सोने भी न दे". जब बदन पर थप्पड़, चाँटे पड़ते हैं, तो कैसी आवाज आती है, तुम भूल नहीं सकती जिज्जी, मुझे मालूम है. जब जूते की नोक पसलियों के बीच मे जा कर टकराती है तो कैसे चटख सी आवाज़ आती है, तुम्हें अवश्य याद होगा, तुमने भी तो कितनी बार खायी होगी ऐसी मार.

वह खाँसी मुझे सोने नहीं देती जिज्जी. रात रात भर अम्मा खाँसती है आज भी. अम्मा की साड़ी पर लगा खून भी याद होगा तुम्हें? उस पर क्यों नहीं की कृपा तुम्हारे भगवान ने? उस दिन कृपा क्यों नहीं की भगवान ने जब पुलिस ने अम्मा को कूँए से निकाला था? तुम्हें याद है जब काँटे से खींच कर अम्मा को बाहर निकाला था, और अम्मा वहाँ कूएँ के पास पड़ी थी? कैसी सफेद सफेद फूली फूली सी लग रही थी तब अम्मा. आत्महत्या. यह कहा था. मुझे मालूम है कि तुम कुछ नही् भूली हो.

पर भूली नहीं हो तो क्यों चली गयीं तुम उसके पास रहने? यही नहीं समझ पाता हूँ. एक दीवार है, मेरे तुम्हारे बीच और मैं तुम्हें नहीं समझ पाता हूँ जिज्जी. कैसे बदल गयीं तुम इतना?

"बस अब यही इच्छा रह गयी कि तुम्हारा भी घर बसता देख लेती". क्यों जिज्जी तुम्हें अपना घर बसना देख कर संतोष नहीं मिला और कितने घर बसायेंगे हम? तुम्हें अवश्य याद होगा अपना घर बसना, जब वह मुच्छल बूढ़ा तुम्हें खरीद कर ले गया था. याद तो होगा कितना रोई थी तुम, कितने दिन तक. पर उसके दिल पर कुछ असर नही् हुआ था. क्या पाया तुमने जिज्जी आज्ञाकारी पुत्री बन कर? दो बेटे मिले, तुम से भी बड़ी ऊम्र के बेटे, तुम जिनके लिये खाना बनाती थी. वही बेटे जो पिता की मृत्यु के बाद तुम्हें तुम्हारे घर पहुँचा गये थे?

और किस लिये घर बसाऊँ जिज्जी, घर बसाने के मज़े तो देख देख कर आत्मा पहले ही तृप्त हो चुकी है. जब भी मन ही मन में तुमसे बातें करता हूँ, तो लट्टू की तरह घूम जाता है मेरा दिमाग. हर बार वही प्रश्न बार बार आते रहते हैं. कुछ नया नहीं सोच पाता मैं. हर बार वही पुरानी बातें. तुमने जीवन से भाग कर झूठे संतान धर्म के परदे के पीछे छुपने का निर्णय किया है. क्यों किया है यह निर्णय, यह नहीं समझ पाता. पर मैंने ऐसा कोई निर्णय नहीं किया न ही कभी करुँगा. तुम करो उसकी सेवा, तुम रहो विधवापन की जेल में. हम तो आज तुम्हारा जन्म दिन मनायेंगे. जीवन चुना है मैंने, पुरानी किसी दकियानूसी धर्म नियमों का पालन नहीं करना है मुझे.

Short story sunil deepakलिज़ा एमिलियो को बुला रही है. जब वह प्यार से उसे पुकारती है तो कुछ अजीब सा लगता है. एमिलियो उसके मृत पति का नाम था. कहती है बहुत प्यार करती थी उससे, इसी लिये जब अकेलापन लगता है एमिलियो के पास रहने से उसे लगता है कि जैसा उसका अपना एमिलियो लौट आया हो. खाने में अभी कितना समय और लगेगा, मुझसे पूछ रही है. जिज्जी, तुमसे बातें करने में इतना खोया हूँ कि उसे उत्तर देने में कुछ समय लगता है. "बस एक घंटा के करीब और लगेगा." चुप चाप शाँत हो कर बैठ जाती है वह. मालूम है उसे कि आज यादें मुझे कुछ अधिक ही परेशान कर रही हैं, पर वह मुझसे कुछ नहीं पूछेगी. उसे इन्तजार है कि एक दिन जब ठीक समय आयेगा, मैं स्वयं ही उससे सब बातें करुँगा. और मुझे मालूम है कि ऐसा कोई दिन कभी नहीं आयेगा. ये मेरे भीतर के राक्षस इतनी आसानी से किसी से नहीं बाँट सकता मैं.

चिकन को कड़छी से हिलाता हूँ तो अम्मा याद आ जाती है. अम्मा ने तो कभी चिकन नहीं खाया. शायद तुमने भी न खाया हो. वह कभी घर पर माँस ले भी आता था तो सिर्फ मुझे ही बुला कर कभी कभी एक टुकड़ा देता था. तुम्हें याद है जिज्जी कैसे तुम्हें दिखा दिखा कर चटकारे ले कर खाता था मैं?

"तुम्हारी चिट्ठी आती है तो पिता जी ऐसे देखते हैं कि उनके बिना कुछ कहे ही समझ जाती हूँ कि वह यह जानना चाहते हैं कि तुमने क्या लिखा है. बात तो कर नहीं पाते बेचारे. मुँह से लार गिरती रहती है. ऐसे निरीह हो कर देखते हैं कि बहुत दया आती है. भैया तू कैसे इतना निर्मम हो गया?"

एक काम ही तो ठीक किया तुम्हारे भगवान ने, उसे पक्षघात दे कर. मेरा बस चले तो उसे तड़पा तड़पा कर मरना पड़े. हाँ मैं तो हूँ निर्मम, पर उसने क्या किया था हमारे साथ, तुम्हारे साथ, अम्मा के साथ? उसके लिये उसी को सजा मिलनी चाहिये, तुमने क्यों ले ली अपने सर पर यह सजा जिज्जी? कैसे क्षमा कर दिया तुमने उसे? क्या केवल संतान का ही धर्म होता है, पिता का कोई धर्म नहीं होता? क्या किया उसने तुम्हारे लिये जिससे उसे यह अधिकार मिले कि तुम उसकी सेवा करो? जेल मिलनी चाहिये थी उसे.

बस एक ही बात काटती है मुझे अंदर ही अंदर. कुछ भी तो नहीं कर पाया मैं. न तुम्हारे लिये, न अम्मा के लिये. मलाई के पतीले चाहिये थे मुझे, कभी भी न सोचा कि तुम भी तो हो, तुम्हारे मन मे तो कुछ इच्छायें हो सकती हैं. जब तुम्हें बेचा गया था, तो क्यों नहीं रोक पाया मैं? क्यों नहीं की लड़ाई उससे? जब माँ को मारता था वह, क्यों नहीं रोक पाया मैं उसे? तुमने तो क्षमा कर दिया उसे, मैं नहीं कर पाता.

तुम बिक गयीं और मैं कोलिज में पढने की सोच रहा था. उसे सिर्फ मुझसे प्यार था, और मैं ही था उसके भविष्य का सहारा, उसके खानदान और नाम को चलाने वाला कुलदीपक

तुम्हें नही मालूम सारी बातें जिज्जी. तुम्हारी शादी से कुछ दिन पहले कहाँ गया था मैं उसके साथ, तुम यह नहीं जानतीं. जवानी की नसों के ज्वार मे पागल, मैं उसके साथ खुशी खुशी गया था उस जगह. "जवान, कमसिन सी छोरी चाहिये हमारे बेटे के लिये. जवान हो गया मेरा बेटा." जैसा बाप वैसा बेटा, वही गन्दा खून है मेरा. एक हज़ार रुपये दिये थे उसने. मैंने पूछा भी नहीं कि कहाँ से आये थे वे पैसे. तुम्हारे बिकने की पैशीदगी थी वह. कैसे क्षमा कर दूँ उस को? मरने दो साले को, तिल तिल के मरने दो. तुमने तो क्षमा कर दिया उसे, पर मैं नहीं कर पाता, न उसे, न स्वयं को.

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