पुरुष हारमोन टेस्टोस्टिरोन सुनील दीपक, 30 नवंबर 2007

होरमोन शरीर में उत्पन्न होने वाले उन पदार्थों को कहते हैं जो कि शरीर की किसी ग्रन्थी से बन कर रक्त द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में अपना असर दिखाते हैं. शरीर में कई तरह के होरमोन बनते हैं जैसे कि एड्रीनलीन जो दिमाग की एक ग्रन्थी में बनता है और जब मानव डर या गुस्से की भावना को महसूस करे तो शरीर में छोड़ा जाता है जिससे शरीर में रक्त का संचार बढ़ जाता है, दिल की धड़कन बढ़ जाती है, साँसों की तेजी बढ़ जाती है. शरीर में दो होरमोन होते हैं जिनका असर यौन विकास पर पड़ता है, एक होरमोन पुरुष यौन विकास के लिए और दूसरा होरमोन स्त्री गुण विकास के लिए.

टेस्टोस्टिरोन हारमोन पुरुष गुणों को बनाने वाला हारमोन है जो पुरुषों में अण्ड ग्रंथियों में बनता है. आम तौर पर शरीर में दो अण्ड ग्रंथियाँ होती हैं, छोटे अण्डों या गोलियों की तरह, लिंग के नीचे. इन ग्रथियों में लेयडिक के कोष होते हैं जहाँ टेस्टोस्टिरोन बनता है. जब बच्चा किशोरावस्था में पहुँचता है तो शरीर में टेस्टोस्टिरोन का उत्पादन बढ़ जाता है और यह हारमोन शरीर में पुरुष शरीर के गुण बनाता है जैसे कि आवाज का भारी होना, दाढ़ी का बढ़ना, शरीर में बाल निकलना, माँसपेशियों का बढ़ना, यौन अंगों का विकास होना, इत्यादि.

एक वयस्क पुवक की अण्ड ग्रथियाँ प्रतिदिन 5 से 7 मिलीग्राम टेस्टोस्टिरोन बनाती हैं और उसे रक्त में छोड़ती हैं. करीब 98 प्रतिशत हारमोन दो प्रोटीनों के साथ बँध जाता है और हारमोन का प्रमुख प्रभाव 2 प्रतिशत के मुक्त होरमोन से होता है. जिन दो प्रोटीनों से हारमोन बँधता है वह हैं यौन हारमोन बाँधने वाला ग्लोबूलिन यानि सेक्सुअल होरमोन बाईंडिंग ग्लोबूलिन जिससे 60 प्रतिशत होरमोन बँधता है और बाकी का 38 प्रतिशत होरमोन एलबुमिन के प्रोटीन से बँधता है. एलबुमिन से होरमोन का बँधन कुछ कच्चा होता है और आवश्यकता पड़ने पर होरमोन का कुछ हिस्सा मुक्त हो सकता है.

होरमोन का अधिकतर उत्पादन सुबह सात बजे से ग्यारह बजे तक होता है, दिन के साथ साथ हारमोन का उत्पादन कम होता जाता है और शाम होते है अपने न्यूनतम स्तर पर आ जाता है. हारमोन उत्पादन मौसम के साथ भी बदलता है, अक्टूबर के महीने में सबसे अधिक होता है और अप्रैल के महीने में सबसे कम.

जीवन के विभिन्न क्षणों में टेस्टोस्टिरोन का काम भिन्न भिन्न तरीकों से होता है. माँ के गर्भ में इस हारमोन की वजह से भी अगर लड़का है तो उसमें पुरुष यौन अंग बनते हैं. अगर माँ के गर्भ में बच्चे में टेस्टोस्टिरोन कम मिले तो बच्चे में यौन अंगों का विकास ठीक से नहीं हो पाता.

किशोरावस्था में आ कर अगर पुरुष शरीर को सही मात्रा में होरमोन न मिले तो शरीर में पुरुष गुणों का विकास ठीक से नहीं होता. न कद बढ़ता है न दाढ़ी आती है, न आवाज भारी होती है. अण्डग्रँथियों की कुछ बीमारियाँ हो सकती हैं जिनसे वह सही मात्रा में इस होरमोन को नहीं बना पाती. कभी कभी मम्पस यानी कनपेड़ा या गलसुआ की बीमारी भी अण्डग्रंथियों पर असर कर सकती है. इस हालत में किशोर पर मानसिक दबाव पड़ता है और उसके मन में अपनी यौन पहचान के बारे में प्रश्न उठ सकते हैं.

वयस्कों में हारमोन का उत्पादन कम होने से थकान, यौन सम्बंधों के लिए उदासी, यौन सम्बंधों में कठिनाई से ले कर और बहुत से लक्षण दिखते हैं जैसे कि चमड़ी का सूखा होना, शरीर में चर्बी का बढ़ना, आदि. स्ट्रैस, तनाव, हमेशा बैठे बैठे काम करना, व्यायाम न करना, आदि से भी हारमोन के स्तर कम हो जाते हैं.

पर हारमोन कम होना केवल बीमारी नहीं, उम्र के साथ साथ पचास साल की उम्र पार करने पर धीरे धीरे टेस्टोस्टिरोन के स्तर कम होने लगते हैं. जो लोग चुस्त रहते हैं, नियमित व्यायाम करते हैं, उनमें इस कमी का असर कम होता है. जब होरमोन का स्तर कम हो जाये और साथ साथ कुछ शारीरिक लक्षण भी जुड़ जायें तो इसे एन्ड्रोपोज (andropause) का नाम दिया गया जिसकी तुलना नारियों में होने मीनोपाज (menopause) से की जाती है जब स्त्री में माहवारी आनी बंद हो जाती है.

एक समय सोचा जाता था कि समलैंगिकता बीमारी है जिसमें पुरुष शरीर में टेस्टोस्टिरोन हारमोन की कमी होती है पर यह बात शौध में सही नहीं निकली. समलैंगिक पुरुष और विषमलैंगिक पुरुषों में टेस्टोस्टिरोन के स्तरों में कोई भेद नहीं पाया गया. शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा अधिक होने को गँजेंपन से जोड़ा गया है. कई नवयुवक जब कसरत से शरीर की माँसपेशियाँ बढ़ाना चाहते हैं तो वे इसी हारमोन से मिलते जुलते पदार्थों के इन्जेक्शन लगवाते हैं, पर जिसके गलत प्रभाव भी पड़ सकते हैं.

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